कहानी के पात्रों की जीवन में खोज

२० जनवरी २०११

असीमानंद के कथित कुबूलनामे ने हिन्दू कट्टरपंथियों के साथ-साथ इस्लाम के नाम पर अतिवाद फैलाने वाले विघटनकारियों को भी मुसीबत में डाल दिया है। सतही तौर पर इसका लाभ कांग्रेस और अन्य कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों के पक्ष में इस मायने में हुआ गिनाया जा सकता है कि इस कुबूलनामे के जरिए मुस्लिम वोट बैंक को अपने पक्ष में कर उसके समर्थन को जीत की सीटों में तब्दील करने की कवायद पूरी की जा सकती है। पर यह एक मुगालता भी साबित हो सकता है। हमारी राजनीतिक ताकतें धार्मिक समर्थन जुटाकर धर्मनिरपेक्ष सरकारें कायम करने का काम करती हैं। असीमानंद के कथित कुबूलनामे ने कट्टरपंथी तत्वों को आतंकवाद के मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में ला खड़ा किया है और अब उन्हें अपने लिए समर्थन नए सिरे से जुटाना होगा। आतंकवादी घटनाओं में लिप्तता को लेकर असीमानंद के कुबूलनामे के बाद अपने आप को थोड़ा शर्मिंदा महसूस कर रहा हिन्दू समाज का उदारवादी तबका संघ परिवार के इन दावों के साथ सहमति नत्थी नहीं करना चाहेगा कि यह पाकिस्तान की ओर से प्रायोजित आतंकवाद और मुंबई हमले के दोषी आतंकियों को बचाने की कोई सरकारी चाल है। जिस राजनीति में केवल दल परिवर्तन और निष्ठा परिवर्तन को ही नैतिक माना जाता हो उसमें किसी भी प्रकार के हृदय परिवर्तन के लिए गुंजाइश वैसे भी नहीं होती। आतंक की घटनाओं में लिप्त व्यक्ति के संदर्भ में तो हृदय परिवर्तन का मतलब अपनी जान बचाने के लिए सरकार की मुखबिरी के लिए तैयार हो जाना ही माना जाता है। माफिया गिरोहों में तो ऐसे हृदय परिवर्तनों के होने वाले परिणाम मुंबइया फिल्मों में काफी घृणित तरीकों से दिखाए भी जाते हैं। अत: इस तरह के आरोपों या चर्चाओं में कुछ भी चौंकाने वाला नहीं है कि असीमानंद ने अपना कुबूलनामा जांच एजेंसियों के दबाव में दिया है। असीमानंद ने कथित तौर पर सत्य कहने का साहस चाहे यह जानते हुए भी जुटा लिया हो कि कानून में उसकी सजा क्या होती है, कुबूलनामे के कारण जिन भी लोगों की राजनीति और हित प्रभावित हो सकते हैं वे उक्त स्वीकारोक्ति को गले के नीचे उतारने की मन:स्थिति में नहीं पहुंच सकेंगे। असीमानंद ने जिस भी क्षण अपने अंदर के सच को बाहर लाकर घुटन से मुक्त होने का फैसला लिया होगा अंदाज नहीं रहा होगा कि हिन्दू राष्ट्रवाद को लेकर देश की राजनीति में चल रही लड़ाई पर उसका क्या असर होगा और उससे भी ज्यादा यह कि मुस्लिम समाज के उस उदारवादी तबके पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी जो सीमा पार से होने वाले आतंकवाद की भत्र्सना के लिए किसी तर्कसंगत कारण की तलाश में रहता है। यह तबका जानता है कि मुंबई पर हमले का कोई भी अपराधी कभी अपना गुनाह नहीं स्वीकार करने वाला और अगर किसी चमत्कारिक वजह से उसका हृदय परिवर्तन हो जाए, तो उसे भी देश के भीतर और सीमा पार के कट्टरपंथी जांच एजेंसियों के दबाव में की गई स्वीकारोक्ति ही बताएंगे। जांच एजेंसियां और पुलिस नहीं किए गए गुनाहों को भी कुबूल करवाने के लिए जिस तरह के थर्ड डिग्री और अमानवीय तरीकों का इस्तेमाल करने के लिए कुख्यात हैं, उसमें किसी भी कुबूलनामे को शक की नजरों से देखने के लिए पर्याप्त पगडंडियां हमेशा ही मौजूद रहेंगी। आश्चर्यजनक नहीं कि असीमानंद के कथित कुबूलनामे पर एक गांधीवादी मित्र ने ‘द डेली रायजिंग कश्मीर’ में प्रकाशित एक मुस्लिम विद्वान डॉ. सैयद नजीर जिलानी का लेख ‘इंडियाज सेम्योनिच’ पढऩे के लिए भेजा। लेख में कलीम और असीमानंद को लियो ताल्सतॉय के पात्रों दिमित्रिच आक्सीओनोव और मेकर सेम्योनिच का भारतीय प्रतिरूप निरूपित किया गया है। डॉ. जिलानी ने अपने आलेख की शुरुआत ख्यात रूसी रचनाकार लियो ताल्सतॉय की 1872 में लिखी गई लघुकथा से की है जिसमें दिमित्रिच आक्सीओनोव नामक एक व्यापारी को एक ऐसी हत्या के जुर्म में जेल में बंद चित्रित किया गया है जो उसने कभी की ही नहीं थी। कहानी में असली अपराधी मेकर (सेम्योनिच) का आक्सीओनोव की इस चारित्रिक ताकत से हृदय परिवर्तन हो जाता है कि उसने जेल से फरारी हेतु सुरंग खोदने के लिए अधिकारियों को उसका (सेम्योनिच) नाम बताने से इनकार कर दिया। मेकर सेम्योनिच हत्या का जुर्म कुबूल कर लेता है। पर ताल्सतॉय की कहानी में रिहाई का आदेश पहुंचने के पहले ही दिमित्रिच आक्सीओनोव की मौत हो जाती है।

असीमानंद का कथित अथवा अकथित हृदय परिवर्तन मक्का मस्जिद बम विस्फोट की घटना के आरोप में उसी जेल में बंद कलीम नामक शख्स की सेवा भावना से द्रवित होकर हुआ बताया गया है। ताल्सतॉय के पात्र मेकर सेम्योनिच की तरह असीमानंद को भी लगा कि जिस अपराध के लिए कलीम को दोषी बनाया गया है वह उसने तो किया ही नहीं है। इसी के बाद असीमानंद का एक मजिस्ट्रेट के सामने किया गया कुबूलनामा प्रकट हुआ है जो कि इस समय चर्चा में है। असीमानंद और कलीम की कहानी बहु-प्रचारित ‘भगवा आतंकवाद या हिंदू आतंकवाद या संघ से जुड़े आतंकवाद’ के वे ‘इमोशनल ट्विस्ट्स’ हैं जिन्हें राजनीति के मौजूदा माहौल में हजम किया जाना बहुत कठिन है। वह इसलिए कि राजनीति और समाज दोनों की इमोशनल जरूरतें अलग-अलग बना दी गई हैं। इस तरह की ‘सत्यकथाओं’ को बढ़ावा देने से धर्म की व्याख्या राजनीतिक हितों की जरूरत के अनुसार करने के सारे गणित गड़बड़ा सकते हैं। अत: असीमानंद और कलीम को अलग-अलग रखा जाना उन तमाम निहित स्वार्थों के लिए ज्यादा जरूरी हो जाता है जो हृदय परिवर्तन की पूरी प्रक्रिया को ही सत्ता की राजनीति के लिए खतरनाक मानते हैं। खासकर ऐसा हृदय परिवर्तन जिसमें दोनों पात्र दो ऐसे धर्मों अथवा संप्रदायों का प्रतिनिधित्व करते हों जिन्हें मोहरा बनाकर राजनीतिक संगठन राष्ट्रीय स्तर पर परस्पर विरोध की राजनीति में सक्रिय हों। कारण स्पष्ट यह है कि अगर अंततोगत्वा यह सिद्ध हो जाता है कि किसी असीमानंद ने अपना कुबूलनामा स्वेच्छा से दिया है और उसने कानून में उल्लेखित सजा भी स्वीकार कर ली है तो इसमें नायक भी वही बनके उभर सकता है और समाज के उदारवादी तबके की चाहे सीमित ही सही सहानुभूति बटोरने में भी कामयाब हो सकता है। और इसके विपरीत परिस्थिति में भी असीमानंद को तो देर-सबेर सजा मिलती ही है, पर कलीम भी साथ में बंद रहता है और नायकत्व की पताकाएं किन्हीं अन्य शिखरों पर फहराने लगती हैं। फैसला शायद इन्हीं दो अवस्थाओं के बीच लिया जाना है कि असीमानंद का कुबूलनामा अगर एक सत्य है तो उसे असत्य साबित किए जाने की कोशिशों से कैसे बचाया जाए। और अगर वास्तव में ही दबाव में दिलवाया गया है तो उसे किसी और असीमानंद और किसी और कलीम की मदद से कैसे सच्चाई में बदला जा सकता है। निरपराध चाहे कोई असीमानंद हो या कलीम या कोई और लोग उनका आजाद होना जरूरी है। असीमानंद के कथित कुबूलनामे से एक बात तो सिद्ध पाई गई है कि व्यवस्था की ईमानदारी पर संदेह करने के कारण कहीं ज्यादा गंभीर हैं।