कलम की ताकत को जानते थे विनोद मेहता

एक ऐसे वक्त जब संपादकों की जमात लगातार छोटी होती जा रही हो, पत्रकारिता रात-दिन के फर्क के साथ उबासीपूर्ण अंगड़ाइयां ले रही हो, अंधेरे को अंधेरा साबित करना तो दूर उसके बारे में बातचीत करने से भी लोग कतरा रहे हों, केवल अपनी ही शर्तो पर पत्रकारिता करने वाले एक सर्वथा अनौपचारिक पत्रकार-संपादक के एक लंबी बीमारी के बाद अनुपस्थित हो जाने ईमानदारी के साथ महसूस किये जाने में वक्त भी लग सकता है. इस बात का पता करना एक कठिन और निराश करने वाली मेहनत साबित हो सकता है कि विनोद मेहता के कद वाले पत्रकार-संपादक कितनी संख्या में अब हमारे बीच बचे हैं. विनोद मेहता के साथ एक बार उनके दफ्तर में मुलाकात करने का मौका. एक बार पत्रकारों के दल के सदस्य के रूप में पाकिस्तान की यात्र पर जाने का मौका उनके साथ मिला था. दफ्तर में उन्हें रूप में देखा जैसी की उनकी छवि रही है. अपनी कुर्सी पर आराम से पसरे हुए और पैर टेबुल पर. पर, पाकिस्तान में विनोद मेहता एक सहभागी के रूप में पूरी तरह से अनौपचारिक और बिलकुल अपने जैसे. अंग्रेजी भाषा के पत्रकार विनोद मेहता देश के समस्त भाषा-भाषियों के बीच भी समान रूप से लोकप्रिय थे. एक उदारवादी धर्मनिरपेक्ष छवि का ऐसा पत्रकार-संपादक जो अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता पर अपने छोटे से छोटे रिपोर्टर की बात सुनने से कभी इनकार नहीं करता. विनोद मेहता की दृढ़ मान्यता थी कि पत्रकारों को पूरी तरह से पारदर्शी होना चाहिए. वे एक भरोसा किये जा सकनेवाले संपादक थे.

विनोद मेहता एक ऐसे संपादक थे जिन्हें समाचार-पत्रों के मालिक चाहते तो थे पर एक लंबे समय तक उनसे निभा नहीं पाते थे. उनके साथ काम कर चुके या काम करने वाले सभी पत्रकार उनके साथ अंत तक जुड़े रहे. उन्होंने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा. इसका एक बड़ा कारण यह था कि एक अच्छे संपादक से जिस तरह के गुणों की उम्मीद की जा सकती है वे उनमें मौजूद थे. खबरों के प्रति गजब की समझ, पाठकों की अपेक्षाओं के प्रति ईमानदारी और अप्रतिम साहस-विनोद मेहता की विशेषता थी. उनके साथ जुड़े रिपोटर्स और सहयोगी अपनी खबरों को लेकर विनोद मेहता का हाथ हमेशा अनपी पीठ पर पाते थे. उन्होंने कई प्रकाशनों की शुरुआत की पर कई को अनपी इस अनूठी छाप के साथ छोड़ दिया कि उनके चारित्रक कोई और संपादक उनके जैसी सफलता के साथ नहीं चला सकता.

विनोद मेहता की जीवन यात्र और उनकी पत्रकारिता का काफी कुछ दर्शन उनकी दो किताबों ‘लखनऊ ब्वॉय’ और ‘एडिटर अनप्लग्ड’ से हो जाता है. कल्पना से परे लग सकती है विनोद मेहता जैसे ‘सीरियस’ संपादक ने किसी समय अपनी पहली चुनौती के रूप में ‘डेबोनियर’ जैसी रंगीन पत्रिका के री-लांच को चुना होगा. ‘द पॉयनियर’ द संडे, द इंडिपेंडेंट व द इंडिया पोस्ट ऐसे प्रकाशन रहे, जिन्हें उन्होंने चुना और चर्चित बना दिया. पर ज्यादा समय तक नहीं जुड़े रह पाये. सबसे लंबा वक्त उन्होंने आउटलुक को ही दिया. द इंडिपेंडेंट की कहानी तो केवल इसलिए भी याद रखी जायेगी कि 1989 में उसे शुरू करने के बाद केवल 29 दिन तक ही वो उसमें रहे. महाराष्ट्र के सबसे ताकतवर नेता यशवंत राव चव्हाण के खिलाफ एक समाचार के प्रकाशन से मची उथल-पुथल के बाद उन्हें द इंडिपेंडेंट छोड़ना पड़ा.एक ईमानदार संपादक के रूप में विनोद मेहता अपनी सीमाओं से भी परिचित रहते थे और अपने कलम की ताकत से भी. उनकी कमी तो खलनेवाली है.