ऊंचे सरदार, लघु राजनीति

रदार पटेल की दुनियाभर में सबसे ऊंची प्रतिमा स्थापित करने के अवसर का फायदा उठाकर जिस तरह की संकीर्ण राजनीति की जा रही है, उससे तो लौहपुरुष के कद को उनकी वास्तविक ऊंचाई के मुकाबले भी छोटा ही किया जा रहा है। डॉ. मनमोहन सिंह मंगलवार को अहमदाबाद में भारत देश के प्रधानमंत्री के तौर पर और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी गुजरात प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में उपस्थित थे। पर सरदार पटेल की स्मृति में स्थापित संग्रहालय के उद् घाटन प्रसंग पर प्रधानमंत्री ने अपने आपको अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के एक प्रवक्ता के रूप में और नरेंद्र मोदी ने स्वयं को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक के रूप में तब्दील कर लिया। अवसर की गरिमा को पूरी तरह से नकारते हुए दोनों ही नेताओं ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से एक-दूसरे पर कटाक्ष करने में कोई कोताही नहीं बरती। डॉ. मनमोहन सिंह ने यह भूलते हुए कि वे ‘प्रधानमंत्री’ हैं, इस बात का गर्व करने में चूक नहीं की कि वे उसी राजनीतिक दल के सदस्य हैं, जिसके कि साथ सरदार पटेल का संबंध था। और नरेंद्र मोदी ने भी यह जताने में कंजूसी नहीं बरती कि पहले प्रधानमंत्री के पद पर पंडित जवाहरलाल नेहरू के स्थान पर अगर सरदार पटेल होते तो देश की तकदीर और तस्वीर अलग होती। देश की जनता की जेब से वसूले जाने वाले टैक्स की कीमत पर सार्वजनिक रूप से किए जाने वाले इस वैचारिक भ्रष्टाचार का देश की कौन-सी संस्था ऑडिट करके अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपेगी, अभी तय किया जाना शेष है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और राष्ट्र के शिखर-पुरुषों के कंधों पर पर्वतारोहण कर अपनी स्वयं की ऊंचाइयां बढ़ाने का जो राजनीतिक उपक्रम चालू हुआ है, वह इस बात का संकेत है कि सार्वजनिक बहसों के लिए असली मुद्दे अपनी वैधानिकता खोते जा रहे हैं और उनके स्थान पर जनता को भटकाने के लिए भावनाओं के अंधेरे जंगल रोपे जा रहे हैं। धर्म के आधार पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की बारूदी सुरंगें बिछाने का रास्ता चुनने के बजाय अब सर्वमान्य राष्ट्रनायकों द्वारा छोड़ी गई विरासत को संग्रहालयों या ऊंची-ऊंची इमारतों में स्थापित कर जनता की भावनात्मक सहानुभूतियों को राजनीतिक समर्थन में तब्दील करना ज्यादा आसान और जादुई महसूस किया जा रहा है। राहुल गांधी जब जिक्र करते हैं कि अपनी दादी और अपने पिता की हत्या के बाद वे स्वयं भी किस तरह के खतरे से मुखातिब हैं, तब भी वे वही काम कर रहे होते हैं, जैसा राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाने के नाम पर नरेंद्र मोदी संघ के प्रचारक के रूप में करना चाह रहे हैं। इस उपक्रम को धर्मनिरपेक्ष ध्रुवीकरण भी कहा जा सकता है कि अब महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी को एक पाले में रखा जाएगा और स्वामी विवेकानंद और सरदार पटेल आदि को दूसरे पाले में। केंद्र सरकार अगर सरदार पटेल की स्मृति में 31 अक्टूबर के दिन अखबारों में विज्ञापन प्रकाशित कराएगी तो नरेंद्र मोदी उस पर आपत्ति उठाना चाहेंगे। देश को बताया जा रहा है कि सरदार पटेल पर पहला हक किस पार्टी का बनता है। ‘साझा सरकारों’ की मारामारी और मजबूरियों में ‘साझा विरासतों’ के दिन अब लदने जा रहे हैं। उनके लिए कोई जगह नहीं बचने वाली है। राजनेताओं को यह भी पता है कि देश के 562 रजवाड़ों का एकीकरण कर अखंड भारत का निर्माण करने वाले सरदार पटेल आज भाषायी, क्षेत्रीय और राजनीतिक कारणों से बिखरते भारत का दर्द महसूस करने के लिए उपस्थित नहीं हैं।