उनसे ही पूछलें कि फैसला क्या होना था?

२ अक्टूबर २०१०

लखनऊ की अदालत ने जमीन के जिस टुकड़े के तीन हिस्से करके बांटने का फैसला दिया है उसके इर्द-गिर्द फिर कुछ सुलगाकर धुंआ फैलाने की कोशिशें की जा रही हैं। दबे हुए कदमों से ही सही, शुरुआत की जा चुकी है। वे पक्ष जो अयोध्या की विवादास्पद जमीन के लिए वर्षों से अदालती लड़ाई लड़ रहे थे उनके लिए पूरा मामला आस्थाओं से जुड़े होने का भी हो सकता है और उन्हें फैसले से खुश होने के कारण भी गिनाए जा सकते हैं। पर जो धीरे-धीरे उभर कर सामने आ रहा है वह इसलिए डर पैदा करने वाला है कि कुछ छद्म शक्तियों द्वारा उक्त फैसले को एक या दूसरी कौम के लिए अस्तित्व की जीत या हार में रूपांतरित करके दिखाने की कोशिशें चल निकली हैं। कट्टरपंथी या अनुदार किस्म के हिंदुओं और मुसलमानों के दिलों में फैसले की स्वीकार्यता को लेकर वर्तमान में अंदर ही अंदर चल रहे संघर्ष को हवा देने के काम में कुछ कथित धर्म निरपेक्ष जमातों के स्वयंसेवक भी आगे आ गए हैं। अदालतें केवल फैसले ही कर सकती हैं, मानने का काम या तो संबंधित पक्ष करते हैं या फिर मनवाने के लिए शासन अपनी ओर से पहल करके माहौल बनाता है। कोई आश्चर्य नहीं कि लखनऊ फैसले के बाद मायावती और मनमोहन सिंह, दोनों ही सरकारें ‘किंकर्तव्यविमूढ़’ मुद्राओं में हैं। बताया गया है कि तीन महीने तक यथास्थिति कायम रखी जानी है और फैसले से प्रभावित कोई भी पक्ष इस बीच सुप्रीम कोर्ट में जाने के लिए स्वतंत्र है। पर कोई भी यह नहीं बताना चाहता कि पूरे विवाद को किस सीमा तक ले जाने दिया जाएगा और यह भी कि देश की एकता और अखंडता से बड़ी ऐसी कौन सी चीज है जो विवाद के हल की दिशा में दाव पर लगी है। कोई भी पक्ष या कथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें दबी जुबानोंं से भी नहीं कह रही हैं कि अब अदालतों का कोई काम नहीं बचा है, आगे के फैसले आपसी बातचीत से ही लिए जाने चाहिए। हो यह रहा है कि शांति और सद्भाव बनाए रखने की कागजी और जुबानी अपीलों के जरिए ही सब कुछ सामान्य हो जाने का जुआ खेला जा रहा है। साठ सालों की यात्रा के बाद तैयार किए गए हाईकोर्ट के फैसले के आठ हजार पन्नों के बावजूद अगर विवाद के घाव वैसे ही तेजाबी बने रहने दिए जाते हैं तो फिर क्या गारंटी कि सुप्रीम कोर्ट के पास भी कोई ऐसा इलाज उपलब्ध हो जो सभी पक्षों को एक साथ खुश कर सकेगा। मुमकिन यही हो सकता है कि समूचा विवाद सुप्रीम कोर्ट में आगे आने वाले कई वर्षों के लिए लंबित हो जाए और फिर संबंधित पक्षों से जुड़ी नई पीढिय़ां कभी नेतृत्व अपने हाथों में लेकर आपसी बातचीत से निपटारा कर लें। सुप्रीम कोर्ट अगर चाहेगा तो फैसले के खिलाफ पेश की जाने वाली याचिका / याचिकाओं का यथाशीघ्र निपटारा भी कर सकता है। पर कौन आश्वासन देगा कि इस सबके दौरान लखनऊ फैसले का अपने-अपने तरीके से भाष्य करके सांप्रदायिक भावनाओं को हवा देने वाली ताकतें अपना काम दिखाने में सफल नहीं हो जाएंगी? यह आक्षेप अगर सही भी हो कि लखनऊ का फैसला सभी पक्षों को खुश करने की दिशा में एक कोशिश थी तब भी उसे स्वीकार करने में इतना संघर्ष क्यों मचना चाहिए? वास्तव में संघर्ष फैसले को स्वीकार करने का नहीं बल्कि जो पीछे गुजर गया है उसे भुला पाने और नई वास्तविकताओं का सामना कर पाने की क्षमताओं के बीच जद्दोजहद का है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि अदालतें तो भावुक होने को तैयार हैं पर प्रभावित होने वाले पक्ष अपनी ‘जमीनी हकीकतों’ पर ही टिके रहना चाहते हैं। देश उन्हें अपने प्रयोजन में सफल होने देगा, इसमें शक है। क्यों नहीं ऐसा करें कि देश के तमाम ‘निष्पक्ष’ नागरिक फैसले का विरोध करने वाले नेताओं से ही हजारों-लाखों की तादाद में चिट्ठियां लिखकर या एस.एम.एस भेज कर पूछें कि ‘अदालत का फैसला क्या होना चाहिए था?’