ईश्वर दर्शन के संकरे रास्ते

जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में स्थित चामुंडा माता मंदिर में मची भगदड़ में कोई सवा दो सौ लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। मृतकों की संख्या और भी बढ़ सकती है। कोई दो माह पूर्व ही हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित नैना देवी मंदिर की सीढ़ियों पर मची श्रद्धालुओं की भगदड़ में लगभग डेढ़ सौ लोग मारे गए थे। मृतकों में अधिकांश महिलाएं थीं। अपने आराध्य देवी-देवताओं की चौखट पर श्रद्धालुओं के इस तरह से मौत की गोद में समा जाने की घटनाएं न तो अपनी तरह की पहली हैं और न ही अंतिम। उज्जैन स्थित महाकालेश्वर के मंदिर या ओंकारेश्वर में हुई भगदड़ और उनमें हुई मौतें उन परिजनों की स्मृतियों में आज भी जिंदा हैं जिन्होंने अपने नजदीकी लोगों को उनमें खोया है। इन तमाम घटनाओं में दो बातें कॉमन हैं। एक तो यह कि श्रद्धालुओं की मौतें केवल अव्यवस्थाओं के करण हुईं। दूसरी यह कि इन मौतों के लिए कभी किसी को जिम्मेदार करार देकर सजा नहीं दी गई। हर घटना के बाद तरह-तरह की जांचें बैठाईं गईं, उनकी रपटें भी प्राप्त हुईं पर मौतों का सिलसिला नहीं थमा। एक स्थान पर होने वाले हादसे के सबक दूसरे स्थानों पर नहीं लिए गए। जोधपुर के चामुंडा माता मंदिर हादसे के बाद भी लगता नहीं कि कोई सबक लिए जाएंगे। राजस्थान सरकार द्वारा घटना की न्यायिक जांच के आदेश दिए जा चुके हैं। जांच के आदेश तो 3 अगस्त को नैना देवी में मची भगदड़ के बाद भी दिए गए थे। जो चले गए उन्हें भी और जिन परिवारों के सहारे उनसे छूट गए उन्हें भी, इन जांच रपटों से फर्क पड़ने वाला नहीं।

गौर किया जाए कि करोंड़ों रुपए का चढ़ावा प्रतिवर्ष भगवान के नाम पर उन सभी धार्मिक स्थलों को प्राप्त होता है जहां श्रद्धालु बड़ी संख्या में रेलों और बसों में धक्के खाते हुए आस्था के साथ मन्नतें लेकर पहुंचते रहते हैं। किसी भी तरह का भय इन श्रद्धालुओं को अपनी आस्था से विचलित नहीं करता। इन धार्मिक स्थलों पर चंदे और दान में प्राप्त होने वाली करोड़ों की राशि में उन गरीबों का योगदान भी होता है जिनके पास दो वक्त के खाने का ठीक से इंतजाम भी नहीं होता। दुर्घटनाओं के बाद बैठाई जाने वाली जांचों के संदर्भो या निष्कर्षो में इस सत्य के दर्शन कभी नहीं होते कि श्रद्धालुओं की ओर से प्राप्त लाखों-करोड़ों के धन के बावजूद भगवान के दर्शन तक पहुंचने का मार्ग इतना संकरा, ऊबड़-खाबड़, गंदगी और अव्यवस्थाओं से भरा हुआ क्यों रहता है? और इसके लिए किसे और क्या सजा मिलनी चाहिए? जोधपुर घटना की जांच के लिए गठित आयोग को अपनी रपट देने के लिए तीन माह का समय दिया गया है। इस बीच कलेक्टर, एस.पी. सहित ढेर सारे अधिकारियों को कर्तव्यपालन में लापरवाही के आरोप में अपने वर्तमान पदों से हटा दिया गया है। हरेक दुर्घटना के बाद राजनीतिक सत्ताओं द्वारा या तो मृतकों के परिजनों को पैसे बांटे जाते हैं या फिर अफसरों को ताश की गड्डी की तरह ऐसे ही फेंटा जाता है। सकारात्मक कुछ भी कभी निकलता नहीं।

जम्मू के रघुनाथ मंदिर या गांधीनगर के स्वामीनारायण मंदिर या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर आतंकवादी हमलों में होने वाली दस-बीस मौतें भी राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती हैं पर नैना देवी या चामुंडा माता के यहां अव्यवस्थाओं, लापरवाही तथा भ्रष्टाचार के कारण सैकड़ों लोगों का पैरों-तले कुचलकर मर जाना किसी राष्ट्रीय शर्म या चिंता की मांग नहीं करता। नैना देवी और जोधपुर में केवल दो महीनों में ही हुई दो घटनाओं में लगभग चार सौ लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए पर हमारी संवेदनाशून्य मोटी चमड़ी हरकत में आने को तैयार नहीं। मौत का संज्ञान लेने में भी समूची व्यवस्था ने अपने पैमाने बना रखे हैं। इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया जाना जरूरी है कि इस तरह की घटनाएं और मौतें केवल उत्तर भारत के धार्मिक स्थलों में ही क्यों होती हैं? न तो धर्म के प्रति आस्था में दक्षिण भारतीय लोग उत्तर की तुलना में कमजोर हैं और न ही कुछ ऐसा है कि दक्षिण में धार्मिक स्थलों की संख्या उत्तर के मुकाबले कम है। तिरुपति हो या अयप्पा का धार्मिक स्थल या कि रामेश्वरम – इन जैसे और भी स्थानों पर लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता साल ही भर बना रहता है।

शायद नारियल भी उत्तर भारत के मुकाबले कुछ ज्यादा संख्या में फोड़े जाते होंगे। पर कभी सुनने में नहीं आता कि भगदड़ मची और सैकड़ों लोग कुचलकर मर गए। सरकारों के लिए इससे ज्यादा सुकून की बात क्या हो सकती है कि इस तरह की घटनाओं में बच जाने वाला तो ईश्वर का आभार मानता ही है मृतकों के परिजन भी सबकुछ भगवान की इच्छा मानकर संतोष कर लेते हैं। दुनिया के और किसी मुल्क में ऐसा नहीं होता। व्यवस्था की लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण होने वाली मौतों पर चर्चा करना इसलिए भी जरूरी हो गया है कि इस तरह की तो घटनाएं कम नहीं हो रही हैं और श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ रही है। इस भीड़ को काबू में रखना भी जरूरी है और इस बात को सुनिश्चित करना भी कि उसे किसी भी अनियंत्रित भगदड़ का शिकार नहीं बनने दिया जाएगा। मृतकों के परिजनों को दिलासा देने जोधपुर पहुंचे राहुल गांधी ने पुलिस, प्रशासन और पीड़ितों से केवल एक ही सवाल किया कि हादसा कैसे हुआ पर उसका उन्हें कोई उत्तर नहीं मिला। कारण साफ है। राहुल का अगला सवाल फिर यही होता कि ‘तो फिर ऐसा क्यों नहीं किया गया’?। सारे सवालों के जवाब सबको पता हैं, राहुल गांधी को भी। मुंह कोई नहीं खोलना चाहता।