इस बिहारी को तो मुंबई में भी देखा है!

कोसी नदी का पानी अपने किनारों को तोड़ता हुआ लाखों लोगों को अपनी चपेट में नहीं ले लेता तो पता ही नहीं चलता कि देश के नक्शे पर जो बिहार कायम है उसका असली चेहरा कैसा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के साठ सालों के बाद भी देश के गरीब किन हालातों में जिंदा हैं। बाढ़ के पानी में गले-गले तक डूबे हुए बिहारियों के बदन पर कपड़े होते भी हैं या नहीं। अगर होते भी हैं तो किस तरह के और कितने। और अपना किस तरह का सामान वे लोग बाढ़ में बचाने की कोशिश करते हैं। क्या इन लोगों की सूरत कहीं नजदीक से भी उन लोगों से मिलती है जो तीन साल पहले केवल एक दिन की तेज बरसात के कारण भरे पानी से मुंबई में तबाह हो गए थे? बिहार में ऐसी बरबादी तो लगभग हर साल होती है।

इस बार तो जल प्रलय ही हो गया। 16 जिलों में रहने वाली करोड़ों की जनसंख्या प्रभावित हुई है। कोसी पर बने बांध में अगर दरार नहीं पड़ती तो जान ही नहीं पाते कि देश के बाकी हिस्सों से बिहार की मदद के लिए कितने हाथ उठे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर आने वाली आपदाओं से निपटने के लिए सरकारों की तैयारी कितनी है। और कि गरीब जनता के आंसुओं को ईंधन में तब्दील कर राजनीतिक रोटियां बिहार के ही राजनेता किस प्रकार से सेंक सकते हैं। बाढ़ के पानी में गले-गले तक डूबा हुआ यह वही बिहारी है जिसे क्षेत्रवाद की दादागिरी मुंबई की सड़कों पर सरेआम लतियाती रहती है। एक जमाना था जब टीवी चैनल्स नहीं थे और केवल रेडियो और अखबारों की खबरें ही देश की दिनचर्या तय किया करती थीं। असम और बिहार में बाढ़ें तब भी आया करती थीं। जिले के जिले और बस्तियांे की बस्तियां तब भी डूबती थीं। पर तब समूचा देश मदद के लिए सड़कों पर उमड़ पड़ता था। गली-गली और मोहल्ले-मोहल्ले से बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत सामग्री जमा की जाती थी।

कोसी का बांध नहीं टूटता तो कैसे पता चलता कि नदी के पानी के साथ-साथ लोगों ने भी रास्ते बदल लिए हैं। बिहार का फटेहाल गरीब जिस समय कोसी की बाढ़ में डूबा हुआ अपनी जिंदगी को बचाने की जद्दोजहद में लगा हुआ था, देश को जानकारी दी जा रही थी कि वर्ष 1981 से 2005 के बीच के पच्चीस सालों में सवा डालर प्रतिदिन (कोई पचपन रुपए) से कम पर जिंदा रहने वालों की संख्या देश में साठ प्रतिशत से घटकर 42 प्रतिशत रह गई है। और यह भी कि एक डालर प्रतिदिन से कम पर अपनी सांसें गिनने वाले लोगों का आंकड़ा 42 प्रतिशत से घटकर 24 प्रतिशत रह गया है। मतलब यह कि कोई 26 करोड़ लोग अभी भी देश में प्रतिदिन एक डालर से कम पर जिंदा हैं।

महंगाई के ताजा आंकड़ों से इसकी तुलना करें तो कल्पना ही की जा सकती है कि इस एक डॉलर से कम में बिहार की गरीबी कितनी चीजें खरीद सकती है। खाने-पीने का सामान छोड़ दें तो भी शायद डॉक्टर के द्वारा लिखी गई दवाएं भी नहीं ढूंढ़ी जा सकती। अब ऐसी हालत में सोचा जा सकता है कि जिस तरह की राहत का इंतजाम बिहार के बाढ़ पीड़ितों को बचाने के लिए किया गया उससे कितने लोग वाकई जीवित बच सकते हैं। कोसी के कारण हुई तबाही और उससे निपटने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे इंतजाम विकास के नाम पर दिखाई जाने वाली तमाम फिल्मी उपलब्धियों की पोल खोलने के लिए काफी हैं। देश को अब नजर आ रहा है कि रोटी-रोजी की तलाश में अपने परिवारों को हजारों मील पीछे छोड़ देश के महानगरों की सड़कों पर धक्के खाने वाला बिहारी और बाढ़ के पानी में अपने बूढ़े मां-बाप या बिलखते हुए बच्चों को ढूंढ़ने वाला चेहरा, दोनों एक जैसे ही दिखते हैं।

बाढ़ का पानी निश्चित ही पूरी तरह से उतरेगा भी और कोसी का गंगा में जाकर मिलना उसकी नियति भी है। आदमी धोखा दे सकता है पर कोसी और गंगा नहीं। गंगा को भी पता है कि सागर से साक्षात्कार होने तक उसे कितनी यात्रा तय करनी है। पर बिहार की तकदीर आसानी से नहीं बदलने वाली। या तो बाढ़ या अकाल और इन दोनों से बचे तो अत्याचारों के बीच जीने के लिए उसका संघर्ष चलता ही रहेगा। देश में जो 26 करोड़ लोग एक डॉलर से कम पर आज जिंदा हैं उनमें बिहार का पेट भी शामिल है। बाढ़ की डूब में आए कई जिलों में वह सहरसा भी है जिसे कोई चालीस साल पहले संत विनोबा भावे ने अपने ग्राम स्वराज आंदोलन का राष्ट्रीय मोर्चा घोषित किया था। मुझे याद है कि मैं भी तब वहां था।

पिछले दिनों एक मुलाकात के दौरान लंदन में रह रहे एक बड़े पाकिस्तानी पत्रकार ने सवाल किया था कि आपके यहां के लोग कश्मीर को लेकर बहुत ही भावुक बने रहते हैं और दावा भी करते हैं कि वह भारत का कभी न जुदा होने वाला हिस्सा है पर उस इलाके में आए भूकंप को लेकर आपके देश के आम नागरिक ने किस तरह की मदद के लिए हाथ बढ़ाया? यह सही है कि भूकंप प्रभावित एक बड़ा इलाका पाक के कब्जे वाले कश्मीर में है पर उससे क्या फर्क पड़ता है, उसने आगे पूछा। पत्रकार ने यह भी कहा कि कश्मीर के भूकंप पीड़ितों को राहत पहुंचाने का काम तो आज भी जारी है पर आप क्या कर रहे हैं? उस पत्रकार को कैसे बतलाया जाए कि कश्मीर ही नहीं बिहार भी भारत में ही है। पर वहां हुई तबाही को लेकर भी हमारी चिंताएं कश्मीर के भूकंप से ज्यादा अलग नहीं है। राष्ट्रीय संवेदनाओं के स्तर पर एक राष्ट्र के रूप में हम बिहार से भी उतने ही दूर हैं जितने कि कश्मीर से। हम इसे प्रतिशतों में नापे जाने वाले विकास की देन मान सकते हैं कि इंसानी रिश्तों को कायम रखने वाली भावनात्मक बुनियादें या तो आधुनिकता के भूकंपों में जमींदोज हो गई हैं या फिर खुदगर्जी की बाढ़ ने उन्हें लील लिया है।