इस जीत के मायने अलग

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमानों को झुठलाते हुए बराक ओबामा एक बार फिर दुनिया के सबसे सशक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं। चुनाव परिणामों से यही साबित हुआ कि लड़ाई न तो बराबरी की थी और न ही टक्कर कांटे की। ओबामा और रोमनी के बीच उम्र का जितना फासला है वही दोनों को प्राप्त हुए समर्थन में भी व्यक्त हुआ है। ओबामा जब चार साल पहले राष्ट्रपति चुने गए थे तब यही माना गया था कि एक अश्वेत और आधे मुस्लिम डेमोक्रेट उम्मीदवार को श्वेत भवन की सीढ़ियों पर चढ़ाकर अमेरिका के श्वेत बहुमत ने देश की अश्वेत आबादी के प्रति किए गए अत्याचारों का प्रायश्चित किया है। श्वेत अमेरिकी समाज की इस उदारता को दुनिया भर के अश्वेत समाज ने कृतार्थ भाव से ग्रहण भी किया था। श्वेत भवन में एक अश्वेत राष्ट्रपति की उपस्थिति अमेरिकी इतिहास की एक अद्भुत घटना थी। मानकर चला जा रहा था कि वर्ष 2008 में जो इतिहास लिखा गया वह फिर कभी दोहराया नहीं जा सकेगा। पर अपनी विजय के बाद शिकागो में अपने प्रशंसकों और समर्थकों से मुखातिब ओबामा ने जब तालियों की गड़गड़ाहट के बीच घोषणा की कि अमेरिका का जो श्रेष्ठ है वह उसे प्राप्त होना अभी बाकी है तब उनका संकेत शायद इस ओर भी रहा होगा कि अमेरिकी समाज में परिवर्तन का जो दौर 2008 से प्रारंभ हुआ है वह अब थमने वाला नहीं है। जो बराक ओबामा इस बार शिकागो में उपस्थित थे वे चार वर्ष पूर्व के व्यक्तित्व से सर्वथा भिन्ना नजर आ रहे थे। वे उस आत्मविश्वास और साहस से भरे हुए थे जिसकी कि अमेरिका प्रतीक्षा कर रहा था। इसमें कोई शक नहीं रह गया है कि ओबामा की दूसरी पारी उनके पहले कार्यकाल के मुकाबले भिन्न रहने वाली है और उसके संकेत उन्होंने अपने शिकागो उद्बोधन में दे दिए। ओबामा ने जब यह घोषणा की कि आने वाले सप्ताहों में वे रोमनी के साथ बैठकर चर्चा करेंगे कि कैसे मिल-जुलकर काम कर सकते हैं और देश को आगे ले जा सकते हैं, तो निश्चित ही इशारा कर रहे थे कि प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकन पार्टी के समर्थन के बिना वे अपने फैसलों को अंजाम नहीं दे सकेंगे। ओबामा की जीत का व्यापक संदर्भों में मतलब यही है कि अपनी दूसरी पारी में वे केवल अमेरिकी जनता के हितों को ही तरजीह देना चाहते हैं। अत: बहुत मुमकिन है कि भारत जैसे मुल्कों के लिए ओबामा की जीत इस बार वैसी गर्मजोशी भरी साबित न हो जैसी कि उनके पहले कार्यकाल में महसूस की गई थी। निश्चित ही भारत में भी स्थितियां तब के मुकाबले काफी बदल गई हैं जब ओबामा ने अपने पहले राजकीय मेहमान के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह को व्हाइट हाउस के शानदार रात्रि भोज में आमंत्रित किया था। समूचा अमेरिका जानता है कि राष्ट्रपति पद के लिए इस बार जैसा नकारात्मक और विद्वेषपूर्ण संघर्ष अमेरिका में हुआ है उसने अतीत के सारे मानदंडों को ध्वस्त कर दिया है। **इसकी पराकाष्ठा का अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि ओहायो के मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए रोमनी ने दो अरब डॉलर मूल्य के पांच और दस डॉलर के नोट विमान से बरसाए। वे फिर भी चुनाव हार गए।** ओबामा अपनी विजय को अमेरिका की दुनिया पर जीत बतलाना भी चाहते हैं और साबित करना भी। वक्त और अनुभवों के साथ नायक अपने संकल्प और सीमाएं बदलते रहते हैं। ओबामा कोई अपवाद नहीं सिद्ध होने वाले हैं। जब वे कहते हैं कि अमेरिका एक परिवार है और सभी साथ-साथ उठेंगे और गिरेंगे तो उनके वक्तव्य से अमेरिकी राष्ट्रपति के बदलते हुए संकल्पों की ध्वनियां ही सुनाई पड़ती हैं। भारत के लिए ओबामा की जीत के मायने ढूंढ़ने में जल्दबाजी नहीं की जानी चाहिए।
** Wrong interpretation of satire in New Yorker. Regretted and withdrawn on Nov 08, 2012.