‘आम आदमी’ का ‘हाथ’ कांग्रेस के खिलाफ

प्राप्त चुनाव परिणामों को चारों राज्यों की जनता का कांग्रेस के भ्रष्टाचार और उसका अतिरंजित अहंकार के साथ बचाव करने के प्रति व्यक्त हुआ आक्रोश माना जाना चाहिए। यह संकेत है कि लोकसभा के लिए अगले साल होने वाले चुनावों में राज्यों के बाद केंद्र से भी कांग्रेस का सफाया होने वाला है। प्राप्त नतीजे यह भी बताते हैं कि एक के बाद एक राज्य खोती जा रही सवा सौ साल बूढ़ी कांग्रेस अपने पिछले अनुभवों से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को वह अभी भी राजा-महाराजाओं की एक रियासत की तरह ही हंकेलते रहना चाहती है। तय है कि चौंकाने वाले इन परिणामों के बाद देश की राजनीति भी बदलेगी और संसद की सूरत भी। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के परिणाम अपनी जगह, दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ ने अपनी झाड़ू से कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही घरों में कालीनों के नीचे दबे कचरे की जो सफाई की है, वह इन चुनावों का सबसे ज्यादा चमत्कृत करने वाला अध्याय है। दोनों ही दलों के राष्ट्रीय महामंडलेश्वरों की नाक के नीचे हुई सफाई की यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अपने सीमित साधनों के साथ खड़ी हुई एक छोटी-सी पार्टी की साख को आग के हवाले करने में कांग्रेस और भाजपा दोनों ने ही कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, पर आम आदमी ने उसका साथ नहीं छोड़ा। ‘आम आदमी पार्टी’ के चंदे को लेकर अण्णा हजारे अगर अरविंद केजरीवाल की ‘टोपी’ नहीं उछालते और ‘आप’ के खिलाफ चुनावों की पूर्व संध्या पर स्टिंग ऑपरेशन ‘प्रायोजित ‘ नहीं होता, तो दिल्ली में झाड़ूवालों की सरकार भी बन जाती।

केंद्र सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी की वजह से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की फिर से सरकारें बन गईं और राजस्थान तथा दिल्ली में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। पंद्रह वर्षों तक दिल्ली पर राज करने वाली शीला दीक्षित को अपनी व्यक्तिगत पराजय के बाद तो राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। चार राज्यों के चुनावों को लोकसभा का सेमीफायनल केवल इसलिए भी मान लिया जाना चाहिए कि पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक पहचान रखने वाली राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस से जनता अब अपनी उम्मीदें समाप्त कर लेना चाहती है। इस पार्टी के पास न तो राष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रभावशाली नेतृत्व दिखाई देता है और न ही राज्यों को देने के लिए कोई नेतृत्व बचा है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान इसके उदाहरण हैं।

शिवराज सिंह और वसुंधरा राजे की इसे विनम्रता माना जाना चाहिए कि अपनी शानदार जीत का श्रेय वे गुजरात के मुख्यमंत्री को देना चाहते हैं। कांग्रेस नेतृत्व के लिए इसका स्पष्ट संकेत यह है कि नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने के लिए अकेले राहुल गांधी पर ही भरोसा करने का इरादा उसे अब छोड़ देना चाहिए। चाटुकारों से पटी पार्टी के लिए ऐसा करना कठिन हो भी सकता है। चुनाव परिणामों के भारतीय जनता पार्टी के लिए भी संकेत हैं कि तीनों राज्यों में उसे कांग्रेस के खिलाफ वाले निगेटिव वोट भी पर्याप्त संख्या में मिले हैं। पार्टी को दिल्ली के परिणामों से भी सबक लेना पड़ेगा, क्योंकि देश की राजधानी में भी नरेंद्र मोदी ने जबरदस्त तरीके से प्रचार किया था।

चुनाव परिणामों के बाद सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने जिस ‘ईमानदारी’ के साथ कांग्रेस की पराजय को स्वीकार कर अपनी पार्टी को आम आदमी के साथ जोड़ने का आश्वासन दिया है, उसे इसी कड़वी सच्चाई के साथ गले के नीचे उतारा जा सकता है कि वक्त अब काफी कम बचा है।