‘आप’ के मुकाबले ‘मीडिया’ और ‘सरकार’

“आम आदमी पार्टी” के खिलाफ एक स्टिंग ऑपरेशन शायद जरूरी भी हो गया था। दो कारणों से : पहला तो यह कि शुचिता और पारदर्शिता की राजनीति करने का आम आदमी से वायदा करके दिल्ली विधानसभा के चुनावों में वोट मांगने वाली पार्टी को इस बात का पता चलना चाहिए था कि ‘ईमानदारी’ का बड़े से बड़ा मसीहा भी संदेहों से ऊपर नहीं है। दूसरा यह कि अरविंद केजरीवाल की आधी बांह की शर्ट की आस्तीन के अंदर भी अगर कुछ गंदगी ‘सफेद’ टोपी लगाकर छुपी हुई है तो उस पर भी झाड़ू लगनी चाहिए। स्टिंग ऑपरेशन के कारण आम आदमी की आंखों में ‘आप’ की कुछ प्रतिभाओं को लेकर शक की किरकिरी तो घर बना ही चुकी है। ‘आप’ को अगले मुकाम तक ले जाने के लिए केवल कविता, शायरी, संगीत और वाक-सौंदर्य से ही काम नहीं चलने वाला। प्रसिद्ध कानूनविद और ‘आप’ के एक सशक्त स्तंभ प्रशांत भूषण ने शुक्रवार को नई दिल्ली में घोषणा की कि स्टिंग ऑपरेशन करने वाली ‘मीडिया सरकार’ संस्था के खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस ‘तुरतं’ दर्ज करवाया जाएगा। ‘आप’ ने न्यूज चैनलों के विरुद्ध भी कार्रवाई करने की धमकी दी है। आम आदमी के ‘विश्वास’ पर इससे कोई असर नहीं पड़ने वाला। जरूरत इस बात की है कि अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव आरोपों की जड़ों में जाएं और कार्रवाई के लिए किसी चुनाव आयोग के फैसले की प्रतीक्षा नहीं करें। अरविंद को इस बात की तह में गोता लगाने की भी जरूरत नहीं है कि ‘स्टिंग ऑपरेशन के पीछे कौन लोग हैं’ इसका पता चले। वे मान लें कि इस स्टिंग ऑपरेशन के पीछे भी देश के आम आदमी का ही हाथ है और मानहानि भी आम आदमी की ही हुई है ‘आप’ की नहीं। सत्ता की राजनीति में इस्तेमाल होने वाली हर तरह की हरकतों से ‘आप’ के मुकाबले की अभी शुरुआत भर हुई है। दिल्ली के चुनावों में दांव पर कई-कई घाघ राजनेताओं और माफियाओं की रोजी-रोटी लगी हुई है। दिल्ली के फैसले का असर प्रधानमंत्री पद के ‘शहजादे’ और ‘साहेब’ दोनों की हैसियतों पर पड़ने वाला है और इसके ही दम पर छह महीने बाद एक दूसरी बड़ी लड़ाई लड़ी जाने वाली है।

स्टिंग ऑपरेशन को लेकर ‘आप’ के कर्णधार बेवजह अपना ‘आपा’ खो रहे हैं, जिसकी कि कोई जरूरत नहीं है। बहुत मुमकिन है कि चुनाव आयोग को ‘मीडिया सरकार’ द्वारा सौंपी गई पूरी रिकॉर्डिंग की जांच का मतदान पूरा होने तक समय ही नहीं मिल पाए और दिल्ली के मतदाताओं के मन में कुमार विश्वास, शाजिया इल्मी और छह अन्य को लेकर पैदा हुआ संदेह अंत तक बना रहे। या फिर ऐसा हो कि पूरी रिकॉर्डिंग की जांच में ऐसा और कुछ उजागर हो जाए, जो ज्यादा चौंकाने वाला साबित हो। ‘आप’ के पीछे ‘मीडिया’ भी है और ‘सरकार’ भी। योगेंद्र यादव का कहना है कि ‘शाजिया वैसे भी ज्यादा संवेदनशील हैं।’ शाजिया ने स्टिंग ऑपरेशन में लगे आरोपों के चलते चुनावी मैदान से हटने की पेशकश की थी। ‘आप’ के नेता राजनीतिक रूप से थोड़ी-सी बुद्धिमानी दिखाते तो जांच में निर्दोष साबित होकर उभरने तक शाजिया की कुर्बानी कुबूल कर लेते। ‘आप’ के नेता नई दिल्ली के रामकृष्णपुरम चुनावी क्षेत्र से शाजिया के भाई को जीतने का मौका दे देते, जो अपनी मां के समर्थन से शाजिया के ही खिलाफ वहां से चुनाव लड़ रहे हैं।

राजनीति में नैतिकता की स्थापना के लिए साहस के उदाहरण पेश करना एक चुनौतीभरा काम है। अण्णा हजारे की 17 नवंबर की तीखी चिठ्ठी का 18 नवंबर को अरविंद द्वारा दिया गया जवाब हवाई जहाज से लेकर रालेगण सिद्धी पहुंचने वाले कुमार विश्वास को तब अंदाज नहीं रहा होगा कि उनके दिल्ली वापस लौटते ही चिठ्ठी में किए गए दावों की विश्वसनीयता को चुनौती मिलने लगेगी। 4 फरवरी 1922 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांव चौरी चौरा में ‘खिलाफत मूवमेंट’ और ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ के कार्यकर्ताओं का स्थानीय पुलिस के साथ संघर्ष हो गया था और आक्रोशित भीड़ ने स्थानीय पुलिस चौकी को आग के हवाले कर दिया था। गांधीजी के लिए यह हिंसा असहनीय थी। इससे व्यथित होकर उन्होंने न सिर्फ अंग्रेजों के खिलाफ चलाया जा रहा अपना ‘असहयोग आंदोलन’ वापस ले लिया, बारडोली (गुजरात) से शुरू किया जाने वाला ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ भी स्थगित कर दिया था। ‘आप’ के सामने इस समय चुनौती केवल दिल्ली विधानसभा चुनावों में धमाकेदार जीत दर्ज कराने की ही नहीं, उससे कहीं ज्यादा बड़ी और दिल्ली की सीमाओं से बाहर निकलकर दूर तक जाने की है। ‘आप’ को भी गांधीजी की तर्ज पर कुछ तो ‘वापस’ लेने का साहस दिखाना चाहिए था।