आधे सच और पूरे झूठ के बीच

देश की जनता का हैरत में पड़ना स्वाभाविक है कि उसे अब किस पर और कितना भरोसा करना चाहिए? कोयला खदानों के आवंटन में कथित रूप से हुए 1.86 लाख करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार की सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई द्वारा की जा रही जांच के सिलसिले में जिस तरह के खुलासे हो रहे हैं, वे अचंभित करने वाले हैं। सरकार आश्चर्यजनक रूप से इस यकीन को पुख्ता करने में कोई कसर बाकी नहीं रख रही है कि उसकी ईमानदारी और इरादों पर संदेह किया जाना जरूरी है। देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट में पिछले शुक्रवार को जो कुछ भी खुलासा सीबीआई के निदेशक रंजीत सिन्हा ने किया, उसने सरकार के साथ-साथ जांच ब्यूरो की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए।

सीबीआई निदेशक द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पेश किए गए हलफनामे का अर्थ यही लगाया जा सकता है कि सत्ता में काबिज लोग जांच एजेंसी का इस्तेमाल एक ऐसी सुविधा के रूप में करने की नीयत रखते हैं, जो भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के मामलों में उनकी चमड़ी बचाने में मदद करे। साथ ही जब ऐसी कोई स्थिति विपक्षी नेताओं के सिलसिले में उत्पन्न हो तो इस एजेंसी का इस्तेमाल उनके खिलाफ खौफ पैदा करने वाले हथियार के रूप में भी किया जा सके।

रकार को समर्थन जारी रखने की अपनी मजबूरी के रूप में समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी की नेत्री सुश्री मायावती सीबीआई के दबाव को अन्यान्य तरीकों से व्यक्त कर चुके हैं। अण्णा हजारे के नेतृत्व में लोकपाल की स्थापना को लेकर चले प्रभावशाली आंदोलन की यह एक प्रमुख मांग थी कि सीबीआई को एक स्वायत्त संस्था बनाया जाए, सरकार के नियंत्रण से उसे पूरी तरह से मुक्त किया जाए। आश्चर्य नहीं कि अधिकांश राजनीतिक दलों ने इस मांग का स्पष्ट रूप से समर्थन नहीं किया। अण्णा के आंदोलन का हश्र क्या हुआ, यह भी सबको पता है और लोकपाल विधेयक के प्रावधानों को लेकर सरकार ने किस तरह से बाजीगरी की, वह भी इतिहास में दर्ज है।

कोयला घोटाले की जांच के सिलसिले में भ्रष्टाचार के कालिख की परतें अब जैसे-जैसे उघड़ रही हैं, स्थापित यही हो रहा है कि देश की जानकारी में जो कुछ भी आता या लाया जाता है, वह या तो आधा सच होता है, या फिर पूरा झूठ। जितना जाहिर होता है, उससे ज्यादा छुपा लिया जाता है, बाहर नहीं आने दिया जाता।
सीबीआई अपनी जांच सुप्रीम कोर्ट की इस हिदायत के तहत कर रही है कि वह अपनी स्टेटस रिपोर्ट सरकार में किसी भी राजनीतिक व्यक्ति के साथ साझा नहीं करेगी। सुप्रीम कोर्ट में पेश अपने दो-पृष्ठीय हलफनामे में सीबीआई के निदेशक ने अपने ही कौंसुल द्वारा पिछली तारीख पर दिए गए कथन को गलत सिद्ध करते हुए स्वीकार किया कि जांच की ड्राफ्ट स्टेटस रिपोर्ट कानून मंत्री अश्वनी कुमार तथा पीएमओ और कोयला मंत्रालय के अधिकारियों के साथ ‘उनके द्वारा व्यक्त की गई इच्छा’ के आधार पर साझा की गई थी।

ब यह स्पष्ट होना शेष है कि जो रिपोर्ट सरकार से जुड़े लोगों को दिखाई गई थी, उसमें सुप्रीम कोर्ट में पेश किए जाने से पूर्व कोई परिवर्तन किए गए थे अथवा नहीं। चूंकि पूरा प्रकरण न्यायपालिका के विचाराधीन है, प्रधानमंत्री निश्चित ही ऐसे किसी भी अप्रिय सवाल का जवाब नहीं देना चाहेंगे कि इस तरह की परिस्थितियों में नैतिकता का तकाजा और राजधर्म क्या होना चाहिए?
पूछा जाना चाहिए कि न्यायपालिका और जनता के विश्वास के प्रति इस तरह की अवमानना को किस तरह से नैतिक ठहराया जा सकता है? और यह भी कि तमाम संवैधानिक संस्थाओं को पुरुषत्वहीन बनाकर भविष्य के लिए किस तरह की विरासत को आने वाली पीढ़ियों के हाथों में सौंपने का इंतजाम किया जा रहा है। सवाल कोयला खदानों के संदेहपूर्ण आवंटन, 2जी और कॉमनवेल्थ खेलों में हुए भ्रष्टाचार या रक्षा सौदों में बंटने वाली दलाली का नहीं है। बल्कि यह है कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व न सिर्फ जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता में खुद ही सेंध लगा रहा है, उन तमाम पुलों और रास्तों पर षड्यंत्रों की बारूदें भी बिछा रहा है, जिन पर भविष्य की इमारतें खड़ी करने की मुनादी करते हुए उसके कमजोर पैर कभी थकते नहीं।

प्रधानमंत्री और कानून मंत्री के त्यागपत्र से ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला। प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा है कि पिछले नौ वर्षों में विपक्ष कई बार इस्तीफे मांग चुका है। डॉ. मनमोहन सिंह ने यह नहीं बताया कि सरकार ही इतनी बार स्थितियां उत्पन्न कर चुकी है कि उससे इस्तीफों की मांग की जाए। सीबीआई के निदेशक द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे से उपजे विवाद के बाद कानून मंत्री ने यही कहा कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है। सत्य अंतत: सामने आ जाएगा। जनता भी अच्छे से समझती है कि सरकार द्वारा सारी कसरत ‘सच’ को सामने नहीं आने देने के लिए की जा रही है और न्यायपालिका के जरिए उसके ‘झूठ’ का पर्दाफाश हो रहा है।