आतंकवाद: फिर वही सवाल

७ सितंबर २०११

देश में सबसे अधिक सुरक्षा प्राप्त शहर दिल्ली आज सबसे ज्यादा असुरक्षित बन गया है। केवल तीन महीने तेरह दिन बाद ही दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर एक और बम धमाका हो गया। पिछला धमाका 25 मई को न्यायालय के गेट नम्बर सात के पास वकीलों की पार्किंग में हुआ था। इस बार गेट नम्बर पांच पर उस समय हुआ जब वहां सबसे ज्यादा भीड़ थी। पिछली बार जान-माल का कोई नुकसान नहीं हुआ था। इस बार के नुकसान ने दिल्ली और देश को हिलाकर रख दिया है। संसद भवन से लगभग दो किलोमीटर की दूरी और सुप्रीम कोर्ट के काफी नजदीक स्थित इस अत्यंत ही वीवीआईपी इलाके में हुए विस्फोट ने देश की सुरक्षा और आतंकवाद से सफलतापूर्वक निपट पाने को लेकर सरकार की क्षमता पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हताहतों को देखने के लिए नई दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचे कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के समक्ष व्यक्त हुआ नागरिकों का रोष इस बात का सबूत है कि आतंकवाद को लेकर जन-असंतोष अब अनियंत्रित होने लगा है। अपनी हिफाजत को लेकर नागरिकों का देश की सुरक्षा व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसियों के प्रति विश्वास का लगातार कम होना जनता की असहाय बनती स्थिति की ओर ही इशारा करता है। हालत यह हो गई है कि देश जब तक आतंकवाद की एक घटना से उबरने की कोशिश करता है, दूसरी हो जाती है और नागरिक अपने आपको ठगा-सा महसूस करने लगता है। बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के बाहर सफलतापूर्वक अंजाम दी गई आतंकवादी कार्रवाई का ज्यादा चिंतित करने वाला पहलू यह है कि उस समय संसद की कार्यवाही भी चल रही थी। उसी संसद की जिसकी आबरू पर लगभग दस वर्ष पूर्व (1३ दिसंबर 2001) हमला किया गया था और जिसके कारण समूचे देश का सिर आज भी शर्म से झुका हुआ है। 25 मई 2011 को दिल्ली उच्च न्यायालय की लायर्स पार्किंग में किया गया विस्फोट अगर केवल आने वाले दिनों का संकेत था तो बुधवार की वारदात एक जबरदस्त चेतावनी है कि आतंकवाद के हाथों में हथकडिय़ां नहीं डाली गईं तो नागरिक सुरक्षा के मोर्चे पर हर तरह की घटना संभव है। अब कोई भी, कहीं भी सुरक्षित नहीं है। आतंकवादी केवल संसद ही नही, किसी भी ठिकाने को अपना निशाना बनाकर देश के पुरुषार्थ को चुनौती दे सकते हैं। स्थापित होता जा रहा है कि दुनिया के और तमाम मुल्क अपनी पिछली कमियों और कमजोरियों से सबक लेते हैं और अपने नागरिकों के विश्वास की रीढ़ में दरार नहीं आने देते। पर हमारे अनुभव अभी उतने भरोसेदार नहीं बन पाए हैं। अगर ऐसा हुआ होता तो दिल्ली उच्च न्यायालय के क्षेत्र में ही साढ़े तीन महीने पहले हुई घटना से सबक लेते हुए समूची सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद कर दी गई होती। पर वैसा नहीं हुआ। आतंकवादियों ने अपनी कार्रवाई से हमारे भरोसे में एक बड़ा गड्ढा करके दिखा दिया और हमें उनके स्कैच जारी करने के लिए छोड़ दिया। उच्च न्यायालय के गेट के आसपास न तो क्लोज सर्किट टीवी कैमरे लगे थे और न ही मेटल डिटेक्टर काम कर रहे थे। आतंकवादी एक छोटे से ब्रीफकेस का इस्तेमाल करके समूचे राष्ट्र की ताकत को चुनौती देकर गायब हो गए। देश की जनता और विदेशों में बसने वाले करोड़ों भारतीय भौचक्के हैं कि अगर राजधानी दिल्ली जैसे अति सुरक्षा प्राप्त महानगर को भी आतंकवादी लगातार अपने निशाने पर ले सकते हैं और नागरिकों को अपाहिज बना सकते हैं तो फिर बाकी हजारों छोटे-बड़े नगरों-महानगरों और गांवों की हिफाजत के लिए किसके आगे हाथ फैलाने पडेंग़े। प्रत्येक ऐसी घटना के बाद ऐसा क्यों होता है कि सारे प्रयास केवल कार्रवाई को अंजाम देने वाले संगठनों का नाम-पता ढूंढऩे और अपराधियों की तलाशी में तो झोंक दिए जाते हैं पर इस बात की जानकारी जनता को कभी नहीं मिलती कि हमारे स्तर पर चूक कैसे हुई और उसके लिए किसे और कब जिम्मेदार ठहराया गया। एक अनुमान के मुताबिक पिछले डेढ़-दशक में इस तरह की कोई डेढ़ दर्जन से अधिक घटनाएं देश की राजधानी में हो चुकी हैं, पर ऐसे दस लोगों या एजेंसियों के नामों का खुलासा नहीं हुआ है जिनकी चूक या कमजोरियों के परिणाम निहत्थे और असहाय नागरिकों को भुगतने पड़े हैं। आरोप निरर्थक नहीं कि आतंकवाद और आतंकी घटनाओं की प्रकृति और उसमें इस्तेमाल किए जाने वाले हथियार और उसकी रणनीति तो लगातार बदलती जा रही है पर उससे निपटने की हमारी मन:स्थिति और गति पूर्ववत ही कायम है। मुंबई पर हुए 26/11 के हमले और उसके बाद की घटनाएं इसका प्रमाण हैं कि कहीं कुछ नहीं बदला है। नागरिकों को अभ्यस्त बनाया जा रहा है कि आम चुनावों की तरह ही वे अपनी सुरक्षा पर होने वाले हमलों की भी तैयारी करते रहें। और ऐसी प्रत्येक घटना के बाद सत्ता के शिखर पुरुष सिर झुकाकर मुआवजों के साथ-साथ आश्वासनों के गंडे-ताबीज और डोरे बांटते रहें। कल्पना करके भी सिरहन होती है कि हमारी सुरक्षा व्यवस्था के पैबंदों का फायदा उठाते हुए आतंकियों ने अपनी जिस घिनौनी हरकत को देश की न्यायपालिका के दरवाजे पर अंजाम दिया वैसा ही कोई कृत्य अगर रामलीला मैदान में जमा हुए हजारों अन्ना समर्थकों के बीच हो जाता तो उसके क्या परिणाम होते! बुधवार की घटना के बाद दिल्ली के साथ ही देश में भी हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया है। हाई अलर्ट का मतलब नागरिकों को उस तरह की चौकसी पर रखने का होता है जो असामान्य परिस्थितियों के कारण उत्पन्न होती है। निश्चित ही इसे शहरों और नागरिकों का स्थायी भाव नहीं बनाया जा सकता है। खेद व्यक्त किया जा सकता है कि आतंकवाद से निपटने के मामले में कोई भी सरकार अभी तक नागरिकों की भागदारी तय नहीं कर पाई है। इसलिए जैसे-जैसे वक्त बीतता जाएगा, सरकारों और उनके मातहत काम करने वाली सुरक्षा एजेंसियों से पूछे जाने वाले सवालों की फेहरिस्त बढ़ती ही जाएगी। सही पूछा जाए तो आतंकवाद की घटनाएं सरकार की उस सत्ता और हैसियत को चुनौती है जिसके लिए उसने अपने नागरिकों से अधिकार प्राप्त किया है। वक्त आने पर नागरिक अपना अधिकार वापस भी मांग सकते हैं। नागरिकों की चिंता यही है कि जो आदमी सुबह टिफिन लेकर घर से बाहर गया है उसकी शाम को वापसी जरूरी है और इसे सुनिश्चित करना सरकार का काम है।