आडवाणी को अंतत: ‘मोदी सत्य’ की प्राप्ति!

भारतीय जनता पार्टी के ‘पितृ पुरुष’ ने अपना और अपनी ‘मातृ संस्था’ का बिना ज्यादा वक्त खराब किए ‘मोदी सत्य’ को प्राप्त कर लिया। अब वे सोमनाथ से एक बार फिर अपनी यात्रा की शुरुआत कर सकते हैं। गोवा के बाद हैदराबाद, त्रिचि, भोपाल, दिल्ली आदि स्थानों पर आयोजित सभाओं में गुजरात के मुख्यमंत्री के स्वागत में उमड़ी अपरंपार भीड़ से समझौता कर लेने के बाद आडवाणीजी ने महसूस कर लिया कि नरेंद्र भाई अगर प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन्हें प्रसन्न्ता और गर्व का अनुभव करना चाहिए। इसके लिए उन्होंने अहमदाबाद की यात्रा करना उचित समझा, जहां आडवाणीजी के लिए मोदी ने कमल के फूलों के रंग वाले कालीन बिछाकर रखे थे। मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से ही दिल्ली में पृथ्वीराज रोड स्थित विशाल बंगले में अपना स्वयं का मूड खराब करके बैठे आडवाणीजी के रवैये पर पहला और बड़ा सार्वजनिक हमला बिहार के मोदी ने किया था। सुशील कुमार मोदी ने टि्वटर पर आरोप लगाया था कि आडवाणी को देश के मूड का पता नहीं है। बुधवार को अहमदाबाद पहुंचकर आडवाणी ने अपना और नरेंद्र मोदी दोनों का मूड भी ठीक कर लिया और संघ को संदेश भी पहुंचा दिया कि वे देश का मूड अब पूरी तरह से समझ चुके हैं। अब बारी उन पार्टी नेताओं की है, जो अभी भी नहीं समझना चाह रहे हैं। आडवाणी द्वारा किया गया उलटफेर बताता है कि भारतीय जनता पार्टी के अंदरूनी हलकों में ‘आपसी तौर पर’ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ पार्टी के रिश्तों को लेकर किस तरह की खींचतान मची हुई है। इसमें दो मत नहीं है कि भाजपा की असली कमान इस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हाथों में ही है और सारे अहम फैसले संघ प्रमुख मोहनराव भागवत की सहमति से ही हो रहे हैं। देश के मूड को जानते हुए ही संघ ने मोदी को पहले चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख और बाद में प्रधानमंत्री पद का पार्टी-उम्मीदवार घोषित करवा दिया। माना जा सकता है कि राजनीतिक परिस्थितियों के मद्देनजर संघ और मोदी दोनों ने ही अपने बीच ‘वैचारिक संघर्ष’ विराम भी कर लिया और आंशिक ‘हृदय परिवर्तन’ भी। आडवाणीजी के मन में मोदी के प्रति उमड़े ताजा प्रेम की लहरें अब नागपुर स्थित संघ के तट को कितना प्रभावित करने वाली हैं, हाल-फिलहाल अनुमान ही लगाया जा सकता है। मोदी और आडवाणी दोनों के ही पास मोहनराव भागवत और भैयाजी जोशी के एक राजनीतिक पार्टी के रूप में कायम भाजपा पर बढ़ते प्रभाव और हस्तक्षेप को लेकर चिंतित होने के अलग-अलग कारण हो सकते हैं। मोदी के मन में यह आशंका हमेशा कायम रहने वाली है कि संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों के साथ गुजरात में जो कुछ भी ‘अप्रिय’ हुआ, क्या उसके बाद भी गुजरात के मुख्यमंत्री संघ की स्थायी पसंद हैं या कि उसकी केवल तात्कालिक मजबूरी। इसी तरह जिन्ना प्रकरण को लेकर संघ और आडवाणी के बीच जो कटुता पैदा हुई थी, जिसके कि कारण ‘पितृपुरुष’ को अपना पद छोड़ना पड़ा था, क्या वह अब खत्म हो गई है? यह संघर्ष विराम मोदी और आडवाणी के बीच हुआ है या संघ और आडवाणी के बीच? और यह भी कि अहमदाबाद में बुधवार को जो शानदार प्रसंग उपस्थित हुआ, उसमें गवाही के लिए पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह उपस्थित नहीं थे। भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी राजनीति पर कोई भी टिप्पणी करने के पहले मोहनराव भागवत की ओर से की जाने वाली किसी अगली पहल की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इसमें दो मत नहीं कि प्रधानमंत्री पद पाने के लिए अगर एनडीए के घटक दलों का होना मोदी के लिए आवश्यक है तो संघ के बजाय आडवाणी को अपने साथ ज्यादा दिखाना गुजरात के मुख्यमंत्री के लिए पहली जरूरत। मोदी और आडवाणी के बीच कायम हुई स्थायी-अस्थायी सहमति की दाद दी जा सकती है।