आडवाणी के साथ शिवराज को भी संदेश!

नरेंद्र मोदी ने पितृपुरुष आडवाणी के लिए गांधीनगर की सीट का फैसला करवाकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को भी संदेश भिजवा दिया है कि शिवराज सिंह चौहान चाहें तो भोपाल सीट को अब भर सकते हैं। मोदी ने बुधवार को साफ जतवा दिया कि अब उन्हीं की चलने वाली है, क्योंकि सरकार बनी तो उन्हें ही उसे चलाना है। आडवाणी भोपाल से चुनाव लड़ना चाहते थे और मोदी उन्हें गांधीनगर से ही छठी बार भी लड़वाकर उपकृत करना चाहते थे। आडवाणी इस बार मोदी के मुकाबले शिवराज के साथ अपना चुनावी भाग्य जोड़ना चाहते थे, जो कि गुजरात के मुख्यमंत्री को मंजूर नहीं था। आडवाणी के गांधीनगर छोड़ने का संदेश मोदी की छवि के खिलाफ जा सकता था कि उनके चलते पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। मोदी के सामने संकट स्वयं की छवि और आडवाणी की प्रत्यक्ष या परोक्ष इच्छा दोनों में से किसी एक पर अपनी अंगुली रखने का था। वो उन्होंने रख दी। आडवाणी के लिए गांधीनगर का फैसला करते समय मोदी को पक्का अंदाज रहा होगा कि बात निकली है तो कुछ दूर तक तो अवश्य ही जाएगी। अब ‘च्वाइस’ आडवाणी के समक्ष छोड़ दी गई है कि वे या तो गांधीनगर स्वीकार करें या फिर चुनाव लड़ने का इरादा ही त्याग दें। पार्टी के उम्मीदवारों की घोषणा करते हुए पार्टी के प्रवक्ताओं ने सबसे पहला नाम नरेंद्र मोदी की वडोदरा सीट का लिया, और दूसरे क्रम पर आडवाणी की सीट की घोषणा की। वाराणसी, लखनऊ और कानपुर के लिए नामों का फैसला करने के वक्त वरिष्ठ नेताओं को पार्टी में उनके भावी स्थान के बारे में संकेत दे दिया गया था। इससे आडवाणी को सबक ले लेना था, जो उन्होंने नहीं लिया। इसके बाद तो वर्ष 2009 में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के पोस्टर ब्वॉय को उनकी हैसियत से परिचित करवा दिया गया। आडवाणीजी ने अभ्यास साध रखा है कि नरेंद्र मोदी उन्हें पहले नाराज करेंगे और फिर पार्टी की छवि और एकता के नाम पर अन्य वरिष्ठ नेता उन्हें आकर मनाएंगे और वे अंतत: मान जाएंगे। नरेंद्र मोदी को गोवा में पार्टी की चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बनाने और फिर उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करते वक्त भी दिल्ली के पृथ्वीराज रोड स्थित लालजी के बंगले पर इसी तरह की गतिविधियों के दरबार सजे थे। पूरी बहस का मुद्दा अब केवल एक बिंदु पर पहुंचकर लटक गया है कि आडवाणी मानेंगे कि नहीं। नहीं मानेंगे तो क्या नरेंद्र मोदी अपना फैसला बदल देंगे? भाजपा के हाल के इतिहास पर भरोसा करना हो तो निर्णय आडवाणी को ही बदलना पड़ सकता है। मोदी को पता है कि उनका संकट जारी रहने वाला है। आडवाणी अगर गांधीनगर से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं तो उन्हें जिताना भी पड़ेगा और आगे चलकर इस संकट से भी जूझना है कि अब (उनका) क्या किया जाए?