आडवाणी : अभी राज्यसभा जैसी उम्र नहीं

देश में इस समय जितने भी महत्वाकांक्षी बुजुर्ग राजनीति कर रहे हैं, उनमें लालकृष्ण आडवाणी को सबसे अधिक समझदार माना जा सकता है। 86 वर्ष की उम्र में भी वे लड़ाई के मैदान में डटे रहना चाहते हैं। भारतीय जनता पार्टी के ही कुछ नेताओं की तमाम कोशिशें अपने लालजी को सेवानिवृत्त कर घर बैठाने में सफल नहीं हो सकी हैं। आडवाणी ने मंतव्य जाहिर कर दिया है कि वे राज्यसभा का सदस्य नहीं बनना चाहते हैं, वे चुनाव लड़कर ही लोकसभा में पहुंचना चाहते हैं। निश्चित ही, लालजी का इरादा प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए नए सिरे से चुनौती पैदा कर सकता है। गुजरात के मुख्यमंत्री को पार्टी के ‘पितृ पुरुष’ की आकांक्षाओं का कुछ तो अंदाज पहले से भी रहा होगा। इसका मतलब अब यही है कि गोवा के बाद भाजपा की ओर से एक और आंतरिक शक्ति-प्रदर्शन की उम्मीद की जा सकती है। आडवाणी द्वारा लोकसभा का चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर करने का यह मतलब निकालना मुश्किल नहीं कि मोदी के नेतृत्व में पार्टी को सरकार बनाने लायक बहुमत मिल जाएगा, इसमें देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री को शंका है। वैसी स्थिति में एनडीए के घटक दल किसी सर्वसम्मत नायक की तलाश में आडवाणी के नाम पर सहमत हो सकते हैं। यह बहुत दूर का सोच है और दूरदृष्टि रखने वाले आडवाणी ही इतनी लंबी दूरी की योजना बना सकते हैं। आडवाणी गुजरात के मुख्यमंत्री से उम्मीद कर सकते हैं कि उनके आशीर्वाद के ऐवज में गांधीनगर की लोकसभा सीट उनके लिए सुरक्षित रखी जाए। आडवाणी की दृढ़ इच्छा-शक्ति को देखते हुए भाजपा में प्रधानमंत्री पद के अन्य गुप्त उम्मीदवारों को अपनी रणनीति में परिवर्तन करना पड़ सकता है। एक संभावना यह भी हो सकती है कि केवल लहरें गिनने के लिए आडवाणी ने पार्टी के ठीक-ठाक बहने लगे पानी में फिर से पत्थर उछाला हो। दूसरे यह कि इस बात का खुलासा आगे चलकर आडवाणी स्वयं भी अपने ब्लॉग पर कर सकते हैं कि लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा करने के निर्देश उन्हें क्यों और कहां से प्राप्त हुए थे। भाजपा के अंदरूनी हालातों को देखते हुए जो नजर आता है, वह यही है कि नरेंद्र मोदी को लेकर पार्टी के आकाश पर कोहरा बनाए रखने की कोशिशें जारी हैं। ऐसा किसी सोची-समझी रणनीति के तहत भी हो सकता है। डॉ. मुरली मनोहर जोशी को लेकर भी कहा जा रहा है कि वे भी राज्यसभा में नहीं जाना चाहते और वाराणसी की अपनी पुरानी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं। देखना बाकी रहेगा कि अगर आडवाणी लोकसभा चुनाव लड़ने की अपनी मांग पर डटे रहते हैं तो नरेंद्र मोदी अंतत: क्या फैसला करते हैं। और यह भी कि उनके निर्णय का संघ और पार्टी अध्यक्ष किस सीमा तक समर्थन करते हैं। इतना तय है कि जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें नजदीक आएंगी, नरेंद्र मोदी के लिए भीतर और बाहर से दिक्कतें बढ़ सकती हैं। इसमें यह भी शामिल है कि अरविंद केजरीवाल अपनी ‘आम आदमी पार्टी’ की साख को गिरने से बचाने में जुट सकते हैं और राहुल गांधी की भी यही कोशिश हो सकती है कि कांग्रेस की हालत को और ज्यादा खराब नहीं होने दिया जाए। इन सब हालातों में अगर आडवाणी अपने लिए कोई अवसर देखते हों तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।