आंदोलन जो बदल जाएगा ‘टोपी’ में

‘पॉलिसी पेरेलिसिस” के आरोपों से संघर्ष करती मनमोहन सिंह सरकार अब अगले डेढ़-दो सालों के लिए फिर से चैन की नींद सो सकती है। टीम अण्णा आज यानी 3 अगस्त 2012 शुक्रवार को शाम पाँच बजे अपना दस दिनों से चल रहा अनशन समाप्त कर जंतर-मंतर को हमेशा के लिए खाली कर देगी। टीम अण्णा को आंदोलन के सोलह महीनों के बाद इल्हाम हुआ है कि अनशन में ज्यादा समय नहीं बिताना चाहिए, लोगों को जगाने की जरूरत है। इसके लिए राजनीतिक पार्टी भी बनाई जा सकती है और ‘योग्य” उम्मीदवारों को खड़ा भी किया जा सकता है। शायद ‘सीन” से प्रणब मुखर्जी की अनुपस्थिति का असर था या अपनी ताकत को लेकर अहंकार का कि सरकार ने टीम अण्णा के अनशन को पूरी तरह से नजरअंदाज कर रखा था। कोई चर्चा नहीं। कोई मध्यस्थता नहीं। कोई पुलिस ज्यादती नहीं। कोई गिरफ्तारी, जेल और अस्पताल नहीं। इससे भी अधिक यह कि विपक्षी दलों ने भी अण्णा के स्वास्थ्य की सरकार बराबर ही चिंता की। देश की आत्मा को जगाने का जो विकल्प अण्णा ने अब चुना है वह तो आंदोलन के पहले ही दिन से खुला हुआ था। राजनीतिक पार्टियाँ ही ज्यादा समझदार साबित हुईं। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई किन तरीकों से लड़ी जाए इसको लेकर टीम अण्णा में पहले दिन से ही मतभेद थे। निश्चित ही वे मतभेद अब और बढ़ने वाले हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ जयप्रकाश नारायण की अगुवाई में चले वर्ष 1974 के बिहार आंदोलन के सैंतीस-अड़तीस सालों बाद देश में अण्णा ने पिछले साल अप्रैल में फिर से एक उम्मीद की लौ जलाई थी जो आकार भी लेने लगी थी। अब डर सता रहा है कि ‘अण्णा का आंदोलन”, ‘अण्णा की पार्टी” में तब्दील होने वाला है। ‘मैं भी अण्णा” का उद्घोष करने वाली अण्णा की टोपी अब एक चुनाव चिह्न, पोस्टर और झंडेे में बदलने वाली है। कोई आश्चर्य नहीं कि भ्रष्टाचार के भरोसे सत्ता की राजनीति कराने वाले तमाम राजनेता अण्णा की घोेषणा का स्वागत करते हुए अब उन्हें चुनाव लड़ने की चुनौती दे रहे हैं। सत्य के जो प्रयोग महात्मा गाँधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण ने नहीं किए वे सब अब टीम अण्णा करने वाली है। अरविंद केजरीवाल ने तो सवाल उठाना भी शुरू कर दिया है कि जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से ही लालू यादव जैसे नेताओं का जन्म हुआ था। ‘अत: आप जब विकल्प खड़ा करने की बात करते हैं तो कैसे सुनिश्चित करेंगे कि सिर्फ ईमानदार लोग ही चुने जाएँगे।” देश की राजनीति पर भ्रष्ट राजनेताओं, बाहुबलियों, अपराधियों और निहित स्वार्थों का इतना तगड़ा कब्जा है कि सिविल सोसाइटी कोई राजनीतिक विकल्प खड़ा करके उनका मुकाबला नहीं कर सकती। यह कोई छुपी बात नहीं है कि टीम अण्णा के कुछ प्रमुख नेता राजनीति में प्रवेश के मुद्दे पर एक लंबे समय से अण्णा पर दबाव बनाए हुए थे। सरकार की कमजोरी को टीम अण्णा अपनी ताकत समझने की गलती कर रही थी। वह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थी कि जन लोकपाल बिल के पारित नहीं होने में अगर मनमोहन सिंह सरकार एक बाधा थी तो उससे भी बड़ी बाधा वे विपक्षी दल थे जो परदे के पीछे से सरकार का ही हुकुम बजा रहे थे। विपक्षी दल अगर ठान लेते तो जन लोकपाल विधेयक दिसंबर में ही राज्यसभा में भी पारित हो जाता। गौर करने की बात है कि केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, गोपाल राय और इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ताओं से अनशन समाप्त करने वाली हस्तियों में वे लोग शामिल हैं जिनके अण्णा के कार्यक्रमों के साथ सार्वजनिक रूप से मतभेद रहे हैं और उन्होंने भी अब स्वीकार कर लिया है कि ‘सरकार और विपक्ष ही नहीं बल्कि इस देश के समूचे राजनीतिक निजाम ने लोगों से हेठी की है।” सवाल बच रह जाता है कि आज शुक्रवार की शाम रामलीला मैदान की उस सुबह जैसी तो नहीं ही होगी जब अण्णा ने अपना चिरस्मरणीय अनशन तोड़ा था। तब क्या मान लिया जाए कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में टीम अण्णा का साथ देने के आरोप में देश के नागरिकों को इस तरह की सजा तो मिलनी ही चाहिए थी?