अर्जेंटीनी ‘स्वप्न’ और जर्मन ‘यथार्थ!’

पनी उपलब्धियों को हर्ष के अतिरेक और विफलताओं को आंसुओं के समंदर में तब्दील कर देने के मामले में भारत और ब्राजील-अर्जेंटीना की आत्माओं के बीच अद्भुत समानताओं का बखान किया जा सकता है। जर्मनी और अर्जेंटीना के बीच विश्व कप फुटबॉल का फाइनल मुकाबला शुरू होने के पहले विदेशी विशेषज्ञों की टिप्पणियों के बीच टीवी चैनल पर ‘हार्ट’ और ‘हेड’ को लेकर जो ट्वीट चल रहे थे, उनमें लगभग सभी दर्शक अर्जेंटीना को जीता हुआ और मैसी को ‘मसीहा’ बता रहे थे। अर्जेंटीना पर जर्मनी की जीत के पहले (जर्मनी और नीदरलैंड्स के हाथों) दो बार पिट चुका समूचा ब्राजील रो रहा था। जर्मनी से हार के बाद अब समूचे अर्जेंटीना के आंसू नहीं थम रहे हैं। भारत के फुटबॉलप्रेमियों को लग रहा है, जैसे रियो डी जेनेरियो में अर्जेंटीना की नहीं, बल्कि पराजय भारत की हो गई है। पर इमोशंस से केवल लोगों के दिल जीते जा सकते हैं, युद्ध नहीं। जर्मनी की टीम रियो में ‘विश्वयुद्ध’ लड़ने के लिए मैदान में उतरी हुई थी। वह लातीन अमेरिका के सांबा डांस और शकीरा की मोहक प्रस्तुति के प्रति उदासीन थी। दो-दो विश्वयुद्धों की आग और अपने लाखों देशवासियों की आहुतियों की राख से उबरकर खड़े हुए जर्मन राष्ट्र की फुटबॉल टीम के खिलाड़ी अपने अर्जेंटाइन विरोधियों के प्रति मैदान में पूरी तरह से ‘क्रूर’ और ‘संवेदनाशून्य’ थे। पूरे एक सौ बारह मिनट तक दुनियाभर के फुटबॉलप्रेमियों की सांसें किसी फैसले की प्रतीक्षा में थमी रहीं। पर एक सौ तेरहवें मिनट में 19 नंबर की जर्सी पहने जर्मन टीम का मारियो गोइत्जे नामक लगभग अज्ञात-सा खिलाड़ी मैदान पर प्रकट हुआ। उसने अपनी ही टीम के आंद्रे शुर्ले से मिले पास पर फुटबॉल को पहले अपने सीने पर लिया, और फिर आक्रामक तरीके से उसे समूचे लातीन अमेरिका के सीने में उतार दिया। जर्मनी ने नया इतिहास लिख दिया। दर्शक-दीर्घा में बैठीं जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल ने उस अद्भुत क्षण का गवाह बनने के लिए रियो में अपनी उपस्थिति को सार्थक कर दिया।

र्मन टीम ने रियो में बताया कि मैदान चाहे युद्ध का हो या फुटबॉल का, संघर्ष को पहले सीने पर झेलना पड़ता है। और यह भी कि संघर्ष समूची टीम का होता है, एक व्यक्ति का नहीं। जर्मनी की ओर से ग्यारह खिलाड़ियों की टीम मैदान पर थी, पर दूसरी ओर समूचे अर्जेंटीना की नजरें केवल मैसी के चमत्कार पर ही टिकी थीं कि वे ही मैराडोना के 1986 विश्व कप के इतिहास को फिर से दोहराएंगे। जर्मन टीम का मैनेजर पूरी तरह से ‘कूल’ था, अर्जेंटीना का पूरे समय ‘बेचैन।’ कूल तो मैसी भी थे, पर शायद अपने स्वभावगत कारणों से। जर्मन खिलाड़ी फुटबॉल को फिरकाते हुए व्यवस्थित तरीके से ‘पास’ को मैदान में विरोधी के गोल की तरफ आगे धकेल रहे थे। अर्जेंटीना के खिलाड़ी ‘पास’ को पीछे की ओर धकेलते हुए आगे ले जाना चाहते थे। विश्व कप फुटबॉल का यह फाइनल मैच अंतत: जर्मनी का ही होना था। केवल इसलिए ही नहीं कि जर्मन टीम का प्रत्येक खिलाड़ी अपने आत्मविश्वास को लेकर संकल्प से भरा था। एक राष्ट्र के रूप में जर्मनी ने पश्चिमी यूरोप में जिस तरह से एक आर्थिक शक्ति के रूप में अपना वर्चस्व कायम किया है, रियो की उपलब्धि उसका भी एक प्रतीक थी। जर्मनी की टीम को पता था कि उसे वापस लौटकर अपने देशवासियों का सामना करना है। मैच खत्म होने के ठीक पहले मैसी को भी अंतिम अवसर मिला था, पर वे अपने शॉट को गोइत्जे की तरह निर्णायक गोल में नहीं बदल पाए। और इसके तत्काल बाद जैसे अर्जेंटीना की दुनिया ही बदल गई। उसे भी ब्राजील के साथ दु:ख में शरीक हो जाना पड़ा। अर्जेंटीना के लिए 32 साल के बाद यह दूसरा ‘फॉकलैंड वॉर’ था, जिसमें सामने इंग्लैंड की जगह जर्मनी था। 27 साल के मैसी तब जन्मे भी नहीं थे। और इस बार मैराडोना मैदान में मौजूद नहीं थे।