अब माफी मांगने का वक्त भी गलत चुना

दिल्ली की जनता के विश्वास के साथ की गई ‘धोखाधड़ी’ के लिए ‘आम आदमी पार्टी’ के नेता अरविंद केजरीवाल ने तिहाड़ जेल में प्रवेश करने से पहले देश से माफी मांगी है। लोकसभा चुनाव में ‘आम आदमी पार्टी’ के अपेक्षित या अनपेक्षित सफाये के बाद केजरीवाल को इलहाम हुआ कि दिल्ली में सरकार के गिरने से देश की जनता उनसे काफी नाराज है। दिल्ली में सरकार बन जाने के बाद अरविंद अचानक से घोड़ों पर सवार हो गए थे और उन्हें लगने लगा था कि इस तरह से तो वे देश में भी सरकार बना सकते हैं। वे शायद इन्हीं इरादों के साथ वाराणसी भी पहुंचे थे। उन्हें यकीन था कि जिस तरह से दिल्ली में उन्होंने शीला दीक्षित को हरा दिया, वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी हरा देंगे। अरविंद अपने नाम कोई नया इतिहास लिखना चाहते थे। ‘आम आदमी पार्टी’ ने पहली भूल दिल्ली की जनता के दिल को पढ़ने में की और दूसरी देश की जनता की ‘मैच्योरिटी’ की थाह लेने में।उसे गलतफहमी हो गई थी कि कोई 129 साल जूनी कांग्रेस और पैंतीस वर्षों की अनुभवी भारतीय जनता पार्टी (या और भी अधिक वर्षों के अनुभव वाली जनसंघ) को तीन-चार साल के सड़कीय तजुर्बे के दम पर सत्ता से बेदखल किया जा सकता है। जूता सुंघाकर मिर्गी की बीमारी का इलाज करने जैसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अंतत: वही हश्र हुआ, जो होना था। देश किसी चमत्कारिक नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तो तैयार था, लेकिन ऐसे किसी चमत्कार को हकीकत मानने के लिए तैयार नहीं था, जिसमें आंखों के सामने से ताजमहल गायब कर दिया जाए। अरविंद केजरीवाल को माफी वास्तव में अपनी इस गलती के लिए मांगना चाहिए कि उन्होंने मान लिया कि जनता केवल बिजली और पानी के बिलों को कम करवाना चाहती है और भ्रष्टाचार के खिलाफ चौबीसों घंटे सड़कों पर ही लड़ाई लड़ते रहना चाहती है। देश की जनता की ‘मैच्योरिटी’ इस सच्चाई में निहित है कि कांग्रेस के प्रति उसकी सुनामी नाराजगी और विद्रोह के बावजूद उसे 44 सीटें प्राप्त हो गईं। वर्ष 1984 के चुनावों को याद किया जाए कि तब कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को कितने स्थान लोकसभा में प्राप्त हुए थे? परिपक्व राजनीतिक दलों के बीच इस तरह के उतार-चढ़ाव चलते रहते हैं। दिक्कत यह है कि अरविंद केजरीवाल जिस तरह की तूफानी जल्दबाजी में 14 फरवरी 2014 को थे, जब उन्होंने ‘जनलोकपाल बिल’ को मुद्दा बनाकर दिल्ली में अपनी बनी-बनाई सरकार गिराई थी, वैसी ही जल्दबाजी में वे आज फिर से हैं। वे शायद उम्मीद करना चाहेंगे कि तिहाड़ से जब से बाहर आएं तो दिल्ली के नागरिकों का सैलाब उस तरह से उनकी अगवानी करे, जैसी अण्णा हजारे की तीन साल पहले की गई थी। बहुत मुमकिन है, ऐसा कुछ हो जाए। और न हो तो भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दिल्ली के हालात अब काफी बदल चुके हैं। राजधानी इस समय जश्न की तैयारियों में मग्न है। बनारस और वडोदरा से लाखों मतों की जीत दर्ज कराकर दिल्ली पहुंचे नरेंद्र मोदी का राज्याभिषेक होने जा रहा है। मोदी और केजरीवाल दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। दोनों में काफी फर्क हो गया है। केजरीवाल अपनी यात्रा वहीं से वापस शुरू करना चाहते हैं, जहां उन्होंने 14 फरवरी 2014 को छोड़ दी थी। नरेंद्र मोदी ने 21 मई 2014 को गांधीनगर और गुजरात को पूरी तरह से विदा कह दिया है और उनके वहां वापस लौटने की संभावना नहीं है। कहा जा सकता है कि अरविंद ने अपनी सरकार भी गलत वक्त पर गिराई और क्षमा मांगने का वक्त भी सही नहीं चुना। आम आदमी पार्टी के जो समर्थक तिहाड़ के बाहर अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं, उनकी ईमानदारी पर तो निश्चित ही संदेह नहीं व्यक्त किया जाना चाहिए। उन्हें पता है कि दिल्ली में सरकार बदलने जा रही है।