अब बराबरी की हो गई लड़ाई

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने नितिन गडकरी को उनके पद पर बनाए रखने और अपने आपको पार्टी-अध्यक्ष के साथ खड़े रखने का फैसला किया है। सिद्ध पाया गया कि पार्टी अध्यक्ष के पद पर नियुक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मर्जी से होती है और बनाए रखने का फैसला गुरुमूर्ति की समझाइश से होता है। गौर करने काबिल है कि पार्टी नेताओं की जिस बैठक में गडकरी के प्रति विश्वास और आरोपों के प्रति अविश्वास व्यक्त किया गया उसमें लालकृष्ण आडवाणी अनुपस्थित थे। आडवाणीजी मुंबई में भी उस समय अनुपस्थित हो गए थे जब पार्टी के संविधान में संशोधन कर अध्यक्ष पद के कार्यकाल को बढ़ाने की व्यवस्था की जा रही थी। वैसे भी पार्टी की छवि पर इस बात से कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला था अगर फैसला गडकरी को हटाने के संबंध में ले लिया जाता।

कांग्रेस के नेताओं की मुद्राओं से अंदाज लगाया जा सकता है कि पूरे सीरियल से भाजपा की छवि को जितना भी फायदा या नुकसान होना था वह हो चुका है। व्यक्तिगत तौर पर भी गडकरी के लिए वह क्षण गुजर चुका था जब वे अजित पवार स्टाइल में पद से इस्तीफा देकर अपनी छवि में इजाफा करवा सकते थे, अपने विरोधियों को शांत करने के साथ ही जनता और मीडिया की कमजोर याददाश्त पर भरोसा रखते हुए नए सिरे से विश्वास मत प्राप्त करने में अपने को खपा सकते थे। पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने केवल इतनी पेशकश ही की कि अपने खिलाफ लगे आरोपों को लेकर वे किसी भी तरह की निष्पक्ष जांच के लिए तैयार हैं। ‘तहलका” द्वारा बिछाए गए नकली रक्षा सौदे के जाल में फंसने के तत्काल बाद ही बंगारू लक्ष्मण ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। किस्सा 2001 का है। इसी साल अप्रैल में जब 72 वर्षीय बंगारू को हाई कोर्ट ने चार साल की सजा सुनाई तो वे जेल भी चले गए और पिछले दिनों जमानत मिलने के बाद बाहर आए तब भी कोई हो हल्ला नहीं मचा। पर भाजपा में हालात अब बदल चुके हैं।

क बात जो साफ है वह यह भी कि गडकरी को लेकर इतना शोर नहीं मचता तो भाजपा कभी भी न तो इस तरह से अपने बचाव की मुद्रा में नजर आती और न ही नेतृत्व को लेकर अंदर ही अंदर चल रहा उसका अंतर्कलह कभी सामने आ पाता। गडकरी के अध्यक्ष पद पर बने रहने अथवा नहीं रहने से जनता को ज्यादा फर्क नहीं पड़ता पर इस बात से जरूर पड़ता है कि देश का सबसे बड़ा विपक्षी दल अलग-अलग सत्ता केंद्रों में इतने कमजोर तरीके से बंटा हुआ है। अत: मानकर चला जा सकता है कि भ्रष्टाचार के आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच कांग्रेस और भाजपा के बीच चलने वाली लड़ाई अब बराबरी की हो गई है और संसद के सत्र अब बिना किसी बाधा के चल सकेंगे।