अब नटवर की ‘अंतरात्मा ‘ की आवाज

कुंअर नटवर सिंह की बहुचर्चित, बहुप्रतीक्षित और बहुत विवादित बनने वाली अंग्रेजी किताब ‘वन लाइफ इज नॉट इनफ : एन ऑटोबायोग्राफी’ को हिंदी में समझने के लिए ‘ऐसी कांग्रेस फिर ना मिलेगी दोबारा : कहानी गांधी परिवार की’ कहा जा सकता है। वह इसलिए कि नटवर सिंह ने अपनी उम्र के तिरासी वर्ष पूरे कर लिए हैं और, बकौल उनके, वे अपने पारिवारिक उत्तराधिकारियों के लिए किसी तरह के संदेह के बादल नहीं छोड़कर जाना चाहते थे। गांधी परिवार के साथ अपने रिश्तों की गांठों की परतों को खोलने का उनके लिए इससे बेहतर और कोई वक्त नहीं हो सकता था। क्योंकि कांग्रेस इस समय आजादी के बाद से अपने सबसे कमजोर विकेट पर है और नटवर सिंह उम्मीद कर सकते हैं कि पार्टी उनके जीवनकाल में तो वापस सत्ता में नहीं आएगी। अब सोनिया गांधी ने भी धमकी दे दी है कि वे भी किताब लिखकर समूचे सच को उजागर कर देंगी। नटवर सिंह के धैर्य की दाद दी जा सकती है कि गांधी परिवार के साथ जुडे अपने सच को उजागर करने में उन्होंने इतने वर्षों तक इंतजार किया। इतना इंतजार कि पांच सौ तिरालिस सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस को अपने अब तक के इतिहास की सबसे कम 44 सीटें प्राप्त हुईं।

नटवर सिंह की किताब की क्या विशेषता हो सकती है? क्या यह कि इराकी तेल सौदे पर वोल्कर रिपोर्ट पर बैठाई गई आरएस पाठक जांच कमेटी के निष्कर्षों के आधार पर उनके खिलाफ की गई ‘एकतरफा’ कार्रवाई से वे इतने खफा थे कि अपने प्रति हुए ‘अन्याय’ का बदला लेना चाहते थे? नटवर सिंह इस रहस्योद्घाटन से क्या सिद्ध करना चाहते हैं कि वर्ष 2004 में सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी का ‘अंतरात्मा’ की आवाज पर नहीं, बल्कि अपने बेटे राहुल के चौबीस घंटे के अल्टीमेटम के तहत त्याग किया था? एक बेटे के रूप में राहुल को तब डर था कि अगर उनकी मां प्रधानमंत्री बन गईं, तो उनका भी वही हश्र हो सकता है, जो उनकी दादी और पिता का हुआ था। पर क्या वर्ष 2004 में सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बन ही जातीं तो डॉ. मनमोहन सिंह के मुकाबले अपने आपको इतना बेहतर साबित कर पातीं कि पार्टी को 2009 में फिर से विजयी करवा देतीं? नटवर सिंह के रहस्योद्घाटन से दो बातें हुई हैं। एक तो यह कि राहुल गांधी के प्रति जनता की सहानुभूति बढ़ गई है। दूसरे यह कि वर्ष 2004 में सोनिया गांधी को सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा आमंत्रित नहीं करने को लेकर अफवाहों का जो साम्राज्य स्थापित किया गया था, उसे नटवर सिंह ने अपनी किताब से ध्वस्त कर दिया। तब अफवाहों में यह भी शामिल था कि सोनिया गांधी की ‘भारतीयता’ व उनके ‘विदेशी मूल’ को लेकर राष्ट्रपति भवन में आपत्तियां दर्ज करवाई गई थीं, जिनके कि कारण उन्हें प्रधानमंत्री बनने का अपना इरादा त्यागना पड़ा।

नटवर सिंह ने जाहिर किया है कि सोनिया गांधी उन्हें अपने नजदीक के लोगों में इस हद तक मानती थीं कि जिन बातों का उन्होंने प्रियंका और राहुल के साथ भी कभी जिक्र नहीं किया, उन्हें उनके साथ बांटती रहीं। इस तथ्य के बावजूद जब सोनिया गांधी बेटी प्रियंका के साथ नटवर सिंह द्वारा निर्धारित समय और तारीख को मई 2014 में उनके घर पर इस अनुरोध के साथ पहुंचीं कि किताब से प्रधानमंत्री पद स्वीकार नहीं करने के राहुल संबंधी विवरण को हटा दिया जाए, तो उन्होंने (नटवर सिंह ने) अस्वीकार कर दिया। नटवर सिंह के रहस्योद्घाटन से सोनिया गांधी के इस पक्ष के प्रति सहानुभूति बढ़नी चाहिए कि वे अपने किए के प्रति खेद व्यक्त करने की क्षमता भी रखती हैं और अनुरोध करने के लिए कहीं भी जा सकती हैं। नटवर सिंह को यह भी बताना चाहिए कि वर्ष 2004 में जब कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत नहीं था (145 सीटें) और पार्टी सहयोगी दलों (लालू, मुलायम, वाम पार्टियां आदि) के साथ सरकार बनाने के लिए संघर्ष कर रही थी, तब क्या सोनिया गांधी को सार्वजनिक रूप से यह बयान देना चाहिए था कि उनका ही बेटा उन्हें प्रधानमंत्री पद नहीं लेने दे रहा है? और कि राहुल अपनी मां की सुरक्षा को लेकर ज्यादा चिंतित हैं? सोनिया गांधी ने ‘अंतरात्मा’ की आवाज का हवाला देते हुए (डॉ. शंकरदयाल शर्मा के मना करने पर) मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए तैयार करके क्या देश के साथ धोखा किया?

नटवर सिंह कोई दो दशकों तक कांग्रेस पार्टी के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहे हैं। भारतीय विदेश सेवा की नौकरी से वर्ष 1984 में त्यागपत्र देने के बाद से 2005 तक वे कांग्रेस के एक बड़े नेता के रूप में गांधी परिवार के ‘खास’ बने रहे। भारतीय विदेश सेवा में तीन दशकों के कार्यकाल के दौरान भी श्रीमती इंदिरा गांधी के नजदीकी लोगों में उनका शुमार रहा। पर गांधी परिवार को लेकर इस तरह की अंदरूनी बातें उन्होंने हमेशा अपने सीने तक ही सीमित रखीं। सोनिया गांधी के परिवार के प्रति नटवर सिंह की इतनी वफादारी थी कि प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के साथ मतभेदों के चलते उन्होंने नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह के साथ कांग्रेस छोड़कर ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस (तिवारी) का गठन कर लिया था। वर्ष 1998 में नरसिंह राव के कांग्रेस पार्टी में सूर्यास्त और सोनिया गांधी के सूर्योदय के साथ ही नटवर सिंह फिर से कांग्रेस में आ गए थे। अगर ‘ऑइल फॉर फूड’ भ्रष्टाचार में नटवर सिंह का नाम नहीं उछलता और उन्हें ‘असम्मानजनक’ तरीके से कांग्रेस नहीं छोड़ना पड़ती या सोनिया गांधी अपने फैसले को लेकर काफी पहले ही पूर्व विदेश मंत्री से खेद व्यक्त कर देतीं (7 मई 2014 को नहीं) तो क्या ‘वन लाइफ इज नॉट इनफ’ की पूरी स्क्रिप्ट बदल जाती?

नटवर सिंह की किताब की पीड़ा इन शब्दों में व्यक्त होती है कि 45 वर्षों तक वे गांधी परिवार के प्रति वफादार रहे, पर उनके साथ ऐसा व्यवहार कोई ‘भारतीय’ तो निश्चित ही नहीं कर सकता था। तो क्या नटवर सिंह की किताब को सोनिया गांधी के खिलाफ उनकी व्यक्तिगत नाराजगी का दस्तावेज करार देकर खारिज कर दिया जाए?

उपसंहार: श्रीमती सोनिया गांधी को अपनी किताब जरूर लिखना चाहिए, यह सिद्ध करने के लिए कि उन्होंने अपनी ‘अंतरात्मा’ की आवाज पर ही प्रधानमंत्री पद ठुकराया था, राहुल की धमकी के चलते नहीं। क्योंकि ‘भारतीय’ राजनीति में उनकी यही सबसे बड़ी ‘उपलब्धि’ और ‘योगदान’ भी है। वरना सवाल कायम रह जाएगा कि प्रधानमंत्री पद ठुकराने के बाद भी वे मनमोहन सिंह के कार्यालय से फाइलें क्यों मंगवाती रहीं और ऐसा करने से तब राहुल ने उन्हें क्यों नहीं रोका? साथ ही, अगर प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से सोनिया गांधी की जान को खतरा था तो राहुल स्वयं कैसे आगे चलकर उसी पद के लिए दावेदार हो गए?