अनशन पर अन्ना, सेहत सरकार की खराब

२२ अगस्त २०११

अनशन अन्ना हजारे कर रहे हैं, जान सरकार की दांव पर लगी है। कडक़ती धूप में शरीर अपना आंदोलनकारी जला रहे हैं, पसीना वातानुकूलित कमरों में चहलकदमी कर रही सरकार का बह रहा है। सरकार की चिंता आंदोलनकारियों के लगातार तेज होते नारे नहीं, अन्ना की लगातार धीमी पड़ती आवाज है। अब उसके सारे प्रयास इसी दिशा में हैं कि अनशन तोडऩे के लिए ‘किसी भी तरह से’ अन्ना को मना लिया जाए । अन्ना तैयार नहीं हो रहे हैं। सरकार की नजरें आंदोलनकारियों की बढ़ती हुई संख्या और देश में फैलते समर्थन पर कम और अन्ना के मेडिकल बुलेटिन पर ज्यादा है। डाक्टरों की जितनी बड़ी फौज अन्ना की हिफाजत के लिए लगाई गई है उसका एक-चौथाई भी उनके समूचे गांव रालेगण सिद्धि में कभी नहीं पहुंचा होगा। सरकार केवल अन्ना से बात करना चाहती है, उनकी कोर कमेटी से नहीं। देश की जनता से भी नहीं। सरकार इस तरह की गलतफहमी के अंधेरे में समझौतों की मोमबत्तियां जलाना चाह रही है कि अन्ना अगर जरा सी भी हां कर देंगे तो उसके लिए सबकुछ ठीक हो जाएगा, सत्ता के गलियारों में रोशनी ही रोशनी फैल जाएगी। ईमानदारी की बात करें तो अब आंदोलन और आंदोलनकारी अन्ना के हाथों से निकलकर रामलीला की तरह ही देशव्यापी हो गए हैं। उन पर अब किसका वास्तविक नियंत्रण और नेतृत्व है किसी को पक्की जानकारी नहीं है। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपना सिक्का हवा में उछाल दिया है। उन्होंने मांग कर डाली है कि सरकार ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, वह इस्तीफा दे और नया जनादेश प्राप्त करे। उन्होंने यह घोषणा नहीं की कि भाजपा अन्ना की मांगों और जन लोकपाल का समर्थन करती है और सरकार को उन्हें भाजपा के समर्थन से 30 अगस्त तक पूरा कर देना चाहिए। नौ-दस पार्टियों के तीसरे मोर्चे द्वारा आहूत देशव्यापी विरोध प्रदर्शन आज लड़ाई के बचे हुए मुद्दे भी तय कर देगा। जन लोकपाल बिल का भविष्य जो कुछ भी बने, विपक्षी दलों ने तो अपने भविष्य की तैयारियां प्रारंभ कर दी हैं। सही पूछा जाए तो सरकार इस समय अन्ना के आंदोलन से नहीं बल्कि चुनावों का सामना करने से डर रही है। देश के नागरिकों को ज्यादा चिंता इस बात की नहीं है कि अन्ना का आंदोलन व्यापक होता जा रहा है। खौफ इस सच्चाई से ज्यादा है कि सरकार टोपी पर टोपी धरे बैठी है और केवल अन्ना से बातचीत की खिड़कियां खोलने की कोशिश में उन लोगों के लिए दरवाजे बंद कर रखे हैं जिनके कि वास्तविक प्रभाव में अन्ना इस वक्त हैं। दूसरे यह कि सरकार अन्ना को अभी भी केवल एक ‘मराठी मानुस’ समझने की गलती करते हुए उन्हीं मध्यस्थों को खंगाल रही है जो महाराष्ट्र से संबंध रखते हैं। सरकार इसी मुगालते में आंदोलन से निपटना चाहती है कि फैलती हुई आग को केवल अन्ना को समझा बुझाकर ही ठंडा कर लिया जाएगा। अन्ना तो अब परिवर्तन के प्रतीक बन गए हैं, फैसले तो कहीं और होने हैं। और फैसलों में जनता की भागीदारी भी सरकार को सुनिश्चित करनी पड़ेगी। अन्ना के संकल्प को चूंकि उमड़ती हुई भीड़ के समर्थन ने एक जिद में तब्दील कर दिया है, इस मुद्दे पर अब बहस बेमानी है कि वे और उनके साथी सरकार को ब्लैकमेल और संसद की अवमानना कर रहे हैं। अन्ना जब प्रधानमंत्री और दस जनपथ के दरवाजे खटखटा रहे थे तब सरकार भी उनके साथ सौदेबाजी में लगी हुई थी। देश के सामने दांव पर इस समय यही है कि अन्ना को कुछ नहीं होना चाहिए। इतिहास का कमाल कहें या कुछ और कि अन्ना वास्तव में भी देश बन गए हैं और ईमानदारी तथा विश्वसनीयता के मामले में उन्हें प्रधानमंत्री से ज्यादा नम्बर मिल सकते हैं। परेशानी इस बात को लेकर है कि कांग्रेस अपनी सरकार बचाने की जुगाड़ में है जबकि चिंता उसे देश को बचाने की होनी चाहिए। ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि प्रधानमंत्री स्वयं रामलीला मैदान पहुंचकर अन्ना से बातचीत करने का साहस दिखा दें? मुमकिन है ऐसा करने से कोई नया रास्ता निकल आए और सरकार की छवि भी जनता की नजरों में बढ़ जाए। अब सरकार के स्वास्थ्य को अन्ना की गिरती हालत से अलग करके नहीं देखा जा सकता। अन्ना के स्वास्थ्य की जांच में लगे डाक्टर तो निश्चित ही नहीं बता पाएंगे कि इस हालत के लिए सरकार के लोग ही वास्तव में जिम्मेदार हैं।