अण्णा हजारे या फिर अण्णा हारे?

जून 1975 में जब कांग्रेस पार्टी ने श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में देश को आपातकाल भेंट किया था, तब गांधीजी के प्रथम सत्याग्रही और सर्वोदय आंदोलन के प्रणेता विनोबा भावे ने उसे ‘अनुशासन पर्व’ निरूपित करते हुए उसका स्वागत किया था। अब अड़तीस साल बाद अपने आपको गांधीजी का अनुयायी बताने वाले अण्णा हजारे ने कांग्रेस के उस ‘सरकारी लोकपाल’ बिल के प्रति अपना समर्थन जाहिर कर दिया है, जिसके प्रावधानों के विरोध में अरविंद केजरीवाल के साथ मिलकर चलाए गए अपने आंदोलन के जरिए उन्होंने देश और दुनिया में खलबली पैदा कर दी थी। अण्णा और अरविंद दोनों के ही प्रति लोग अब धीरे-धीरे अपने आपको ठगा हुआ महसूस करने लगेंगे। अण्णा आने वाली पीढ़ियों के लिए पक्का इंतजाम करके जा रहे हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ भविष्य में इस तरह के आंदोलन अगर रामलीला मैदान में खड़े हों तो उनकी ‘ईमानदारी’ पर पूरी तरह से संदेह किया जाना जरूरी है। राज्यसभा में अगर सरकारी लोकपाल बिल पास हो जाता है तो अण्णा के अनशन के साथ-साथ उनके प्रति जनता का विश्वास भी टूट जाएगा।

रविंद केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी’ को अण्णा की उपस्थिति के बिना भी दिल्ली में मिले व्यापक जनसमर्थन से कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों का ही बौखला जाना स्वाभाविक था। दोनों को ही इस कठिन समय में अण्णा की जरूरत थी, जिससे कि ‘आम आदमी पार्टी’ के सिर पर लोकपाल की बंदूक तानी जा सके। राहुल गांधी ‘सरकारी लोकपाल’ बिल के पारित होने को अपनी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बता सकेंगे। जिस ‘जनलोकपाल बिल’ के लिए ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के बैनर तले आंदोलन किया गया था, उसे पारित करवाने की अब नीयत अण्णा की नहीं रही। अण्णा निश्चित ही इस गलतफहमी के शिकार हैं कि ‘आम आदमी पार्टी’ को मिला समर्थन वास्तव में रालेगण सिद्धि में चलने वाली झाडू के कारण है, दिल्ली में चली झाडू के कारण नहीं। पर सरकारी लोकपाल बिल को राज्यसभा के ठंडे बस्ते से निकालकर जीवित करने का परिणाम आगे चलकर अण्णा, कांग्रेस और भाजपा तीनों के लिए आश्चर्यजनक और अनपेक्षित भी साबित हो सकता है। भाजपा द्वारा दिल्ली में सरकार नहीं बनाने के फैसले के बाद सड़क की लड़ाई के लिए मुद्दे की तलाश में फालतू बैठी ‘आम आदमी पार्टी’ को अण्णा ने सरकारी लोकपाल का समर्थन करके एक बड़ा हथियार उपलब्ध करा दिया है। अण्णा अगर केजरीवाल के प्रभाव को ठंडा करने के लिए इस तरह से कांग्रेस और भाजपा के झोलों में नहीं जा बैठते तो अगले चुनावों तक ‘आम आदमी पार्टी’ बिना किसी कामकाज के बेरोजगार हो जाती। अण्णा ने न चाहते हुए भी ‘आम आदमी पार्टी’ में नए सिरे से जान फूंक दी है। अब ‘आप’ के कार्यकर्ता अमेठी सहित देशभर में घूम-घूमकर जनता को समझाएंगे कि सरकारी लोकपाल बिल के साथ अण्णा की विश्वसनीयता को नत्थी करवाकर किस तरह से दोनों प्रमुख दलों ने आपस में भाईचारा निभाया है और भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की व्यवस्था कर ली है। किसी के भी समर्थन से दिल्ली में सरकार बनाकर जिम्मेदारी लेने से भाग रही ‘आम आदमी पार्टी’ को अब इस बात में ज्यादा फायदा नजर आएगा कि सरकारी लोकपाल बिल के पारित होने पर उसे जनता के बीच खुली चुनौती दी जाए। बिल के पारित होते ही अण्णा का अनशन भी समाप्त हो जाएगा और उनके पास कोई काम भी नहीं बचेगा, जिसे लेकर वे अपनी सेहत खराब करें। राजनीतिक दलों का भी बड़ा उद्देश्य पूरा हो जाएगा कि अण्णा और अरविंद को पूरी तरह से अलग कर दिया गया। संदर्भ के लिए उन सभी प्रमुख नेताओं के बयानों की कतरनें निकाली जा सकती हैं, जो उन्होंने समय-समय पर अण्णा के खिलाफ संसद और बाहर सड़कों पर दिए थे। ‘आम आदमी पार्टी’ और अरविंद केजरीवाल के प्रति प्रतिस्पर्द्धा का भाव रखते हुए ‘सरकारी लोकपाल’ बिल को समर्थन देने में अण्णा हजारे चाहे अपनी जीत देखते हों, पर वास्तव में तो राजनीतिक दलों के हाथों उनकी यह हार ही है।

र अंत में : कांग्रेस और भाजपा दोनों के बीच सरकारी लोकपाल पर सहमति है, अत: दोनों मिलकर दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ के खिलाफ सरकार भी बना सकते हैं।