अटलजी की मौजूदगी में “मुखौटों” की तलाश

गु जरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जबसे प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी हवा में उछाली है, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ और धीर-गंभीर नेता लालकृष्ण आडवाणी को रह-रहकर पार्टी के अन्य मुख्यमंत्रियों में अटल बिहारी वाजपेयी की छवि नजर आ रही है। शनिवार को ग्वालियर में पार्टी के एक कार्यक्रम में श्री आडवाणी ने अटलजी के कई गुणों के शिवराजसिंह में होने की चर्चा की और बताया कि कैसे मप्र के मुख्यमंत्री ने एक बीमार राज्य को स्वस्थ बना दिया। दिल्ली में हुई पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में भी लालजी ने शिवराजसिंह के प्रति ऐसी ही भावनाएं व्यक्त की थीं। पार्टी के नेताओं का बड़प्पन है कि अटल बिहारी वाजपेयी के जीवित रहते हुए ही उनकी छवि को वे इस तरह से व्यापक बनाने के अभियान में जुटे हुए हैं। कुछ दिनों पूर्व वरुण गांधी को पार्टी अध्यक्ष राजनाथसिंह में भी अटलजी की छवि नजर आई थी। इसमें दो मत नहीं कि शिवराजसिंह ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने दोनों ही कार्यकालों में काफी उल्लेखनीय कार्य किए हैं। कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने अपने आपसी घमासान के जरिए उनका सहयोग जारी रखा तो शिवराजसिंह तीसरी बार भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो जाएंगे। सवाल यहां यह है कि भारतीय जनता पार्टी में अपने ही एक मुख्यमंत्री की छवि को मोहरा बनाकर दूसरे मुख्यमंत्री के खिलाफ छद्म युद्ध क्यों लड़ा जा रहा है और साथ ही साथ सफाई भी दी जा रही है! यह कोई दबी-छुपी बात नहीं है कि राजनीति में अटलजी की सक्रिय उपस्थिति के दौरान भी और उनकी अस्वस्थता के बाद भी श्री आडवाणी की गिनती उनके एक सर्वमान्य उत्तराधिकारी के रूप में होती रही है। एनडीए के घटक दलों की राय ली जाए तो उस स्थिति में सिवाय इसके ज्यादा फर्क नहीं हुआ है कि आडवाणीजी की उम्र पहले के मुकाबले ज्यादा बढ़ गई है। अत: आडवाणीजी अगर आज भी प्रधानमंत्री पद को पाने की आकांक्षा मन में रखते हों तो पार्टी को उसकी पड़ताल करनी चाहिए। पार्टी में उपस्थित इस तरह की परिस्थितियों में शिवराजसिंह के लिए मन ही मन भी प्रसन्न् होने का कोई कारण नहीं बनता कि उनकी तुलना अटलजी के साथ करके प्रधानमंत्री पद की कथित दावेदारी हेतु उन्हें तैयार किया जा रहा है। मध्यप्रदेश के लोग सीधे होते हैं और दिल्ली के भुलावे में जल्दी से आ जाते हैं। इस तरह की समस्याओं को लेकर कांग्रेस का खेल ज्यादा खुला और सधा हुआ रहता है। उसके किसी भी नेता या नेत्री को सपने में भी खयाल नहीं आता कि उसकी छवि जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी या राजीव गांधी के साथ किसी भी कोने से मेल खाती है। ऐसा सपना अगर भूले से आ जाए तो भी नींद तुरंत टूट जाती है और फिर कई दिनों तक नींद की गोलियां खानी पड़ती है। राजनीति में रुचि रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति समझता है कि राजनाथसिंह और शिवराजसिंह में अगर इतने वर्षों के बाद अटलजी की छवि के दर्शन किए जा रहे हैं तो उसका संबंध भाजपा के भीतर चल रही नेतृत्व की अंदरूनी लड़ाई और नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री के पद के लिए दावेदारी को कमजोर करने से ज्यादा है। अटलजी, अटलजी हैं। उनकी छवि को लेकर केवल मोम के पुतले बनाए जा सकते हैं, उनके क्लोन नहीं। उनके व्यक्तित्व की फोटोकापियां छापकर जनता के बीच नहीं बांटी जा सकती। शिवराजसिंह चौहान अपनी प्रतिभा के दम पर जिस क्षण भी देश की जनता का नेतृत्व करने की क्षमता का प्रदर्शन करना चाहेंगे, उन्हें कोई नहीं रोक पाएगा। पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को पार्टी की अंदरूनी राजनीति का शिकार होने से अब “प्रयासपूर्वक” बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अगर नरेंद्र मोदी अपने गिर के शेरों को मध्यप्रदेश में शिवपुरी के जंगलों में भेजने को तैयार नहीं हो रहे हैं तो उसकी भी कोई राजनीतिक वजह ढूंढ़ी जानी चाहिए।