अज्ञात भय

कुछ हुआ होगा ज़रूर
वे तमाम लोग
जो दिन के उजाले में
घेरे रहे हमेशा मुझे
ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की तरह
चारों ओर से।
अंधेरा होते ही
परछाइयों की तरह
यकायक ग़ायब हो गए
ऐसा नहीं होता कभी –
बंद कर दें रास्‍ते हवाएं ही,
सूख जाएं सारे वृक्ष एक साथ
नहीं सुनाई दे नाद
घरों को लौटती गायों के
गले में झूलती घंटियों का
बदल दे प्रवाह अपना
सारी की सारी नदियां एक साथ,
और पथरा जाएं आंखें
एक अंतहीन प्रतीक्षा में समुद्र की
कहीं कुछ अभागा
हुआ होगा ज़रूर।